बिहार के हर तीसरे घर में पनप रहे एक कवि या लेखक, ये कहना है वरिष्ठ लेखकों का…

एक बिहारी सब पर भारी

बिहार के हर तीसरे घर में एक कवि

बिहार के हर तीसरे घर में एक कवि या लेखक आपको देखने को मिल जायेगा. यह हमारा नहीं, बल्कि शहर के कुछ वरिष्ठ लेखकों का मानना है. वे इसे बेहतर भी मानते हैं, क्योंकि जहां साहित्य का भंडार होता है, वहां पर ज्ञान का भी भंडार होता है.

युवा अब कविता लेखन के साथ-साथ कहानी लेखन में भी आगे आ रहे हैं.  युवाओं का कहानी लेखन कुछ नया नहीं है, लेकिन इंगलिश लिटरेचर को लेकर उपन्यास लिखने की बात उपन्यासप्रेमियों को थोड़ा अचरज में डाल रही है. इससे मान सकते हैं कि सबसे ज्यादा लेखक इंगलिश लिटरेचर को ही बेहतर मान रहे हैं. इन पुस्तकों में कहानी संग्रह, उपन्यास, मोटिवेशनल पुस्तकें शामिल हैं.

Swati Kumari

swati kumari

आज के वक्त में युवा काफी जल्दी संघर्ष से हार मान जाते हैं. संघर्ष न कर पाने की ही वजह से वे डिप्रेशन में चले जाते हैं. इसी डिप्रेशन के कारण वे सुसाइड करने का भी डिसीजन ले लेते हैं. सिर्फ युवा ही नहीं, यह सोच लगभग हर आयु वर्ग के लोगों में आती जा रही है. कंकड़बाग निवासी स्वाति कुमारी ने इसी मुद्दे पर ‘विदआउट ए गुड बाय’ पुस्तक लिखी.

वर्ष 2015 में यह पुस्तक लोगों के हाथ में आयी. लोगों ने इसे काफी सराहा. वे बताती हैं, महिलाएं परेशानी से निकल कर किस प्रकार खूबसूरत लाइफ जी सकती है, उसे इस पुस्तक में लिखा है. मैंने यह पुस्तक अपनी मां के सुसाइड कर लेने के बाद लिखी थी. पुस्तक मैंने अपनी मां को डेडिकेट की है. स्वाति ने इस पुस्तक की सफलता के बाद सुसाइडल थिंकिंग के ऊपर एक और मोटिवेशनल पुस्तक लिखी, उसका नाम ‘Amayra – The essence of life’ है.

 

यह बहुत खुशी की बात है

” मन की अभिव्यक्ति के कारण युवा कविता लेखन में आ रहे हैं. कहानी लेखन में जनसंख्या के रूप में उसी मुताबिक लोग आ रहे हैं जैसे पहले आ रहे थे. अगर साहित्य की बात करें, तो हर तीसरे घर में एक कवि है. कहानी लेखन में ऐसे युवा जो कहानी को लिखने में समय दे पा रहे हैं, वही कहानी लिख रहे हैं. क्योंकि कहानी लेखन आसान नहीं है. मैं प्रशंसा भी करूंगा कि आज की पीढ़ी लेखन में आगे बढ़ रही है. पुस्तक मेले में भी बिहार के कई युवा लेखकों की पुस्तक का विमोचन हुआ था, जो काबिलेतारीफ है. ”

ये कहना है वरिष्ठ लेखक Ratneshwar का।

 

Ashutosh

बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी के निवासी आशुतोष ने बाबा नागार्जुन को आदर्श मान कर ही एक उपन्यास लिख दिया. 16वीं शताब्दी में क्रिस्टोफर मार्लो ने एक नोबेल लिखा था, जिसका नाम ‘डॉक्टर फॉस्टस’ था. उसका अंत कंप्लीट नहीं था. 99 प्रतिशत रीडर्स इससे संतुष्ट नहीं थे. क्रिस्टोफर मार्लो ने जहां से अंत किया था, आशुतोष कुमार ने वहां से शुरुआत करके उपन्यास को हैप्पी एंडिंग वाला उपन्यास बना दिया. वे इस बारे में बताते हैं, डॉक्टर फॉस्टस उपन्यास में यूरोपियन बैकग्राउंड पर सारी कहानी थी, लेकिन मैंने बिहार को मूल में रख कर कहानी लिखी.

इसमें पटना की गंगा नदी और होटल मौर्य की भी चर्चा की. इस पुस्तक में बताया गया है कि सभी बुराइयों की दवा पश्चाताप होती है. साथ ही सच्चाई की हमेशा जीत होती है. मुझे इस उपन्यास के लिए स्टेट एचआरडी मिनिस्ट्री से सम्मानित किया गया था. दरभंगा के मूल निवासी आशुतोष कुमार पटना के राजेन्द्र नगर में रहते हैं. फिलहाल वे नालंदा के पॉलिटेक्निक कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर हैं. इनका सपना है कि वे आइएएस बनें. इनकी एक पुस्तक ‘वरमिलियन’ प्रकाशक के पास है, जो जल्द ही रिलीज होनेवाली है.

Mayank Kashyap

मयंक कश्यप के आसपास कई कहानियां घूमती थीं. लोगों ने कई सुनायी भी. उन्होंने सोचा इसे एक कहानी का संग्रह बना दिया जाये. उन्होंने इसे संग्रह करके वर्ष 2016 में एक पुस्तक लिखी, ‘द फॉरबिडन किंगडम’. इस बारे में वे कहते हैं कि यह कहानी पटना की सच्ची कहानियों का मेल है. मेरा मानना है कि इस कहानी से समाज में संदेश जायेगा. लोग मुहब्बत के नाम पर धोखा करना कम करेंगे. इस किताब में मैंने ऐसी ही कई पहलुओं पर काम किया है.

प्यार को एक लाइन में बांध कर नहीं रखा है. एक दायरा जो सामने नहीं आता है, उसे सामने लाने की कोशिश इस किताब के माध्यम से की है. बताते चलें कि मयंक ने डीएवी से स्कूलिंग करने की है. इसके बाद इन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. उसके बाद फिलहाल ये कॉरपोरेट बैंकर के रूप में दिल्ली में काम कर रहे हैं. पढ़ाई के दौरान ही मयंक ने नोबेल पर काम करना शुरू कर दिया था.

इसके अलावा वे एक ब्लॉग भी चला रहे हैं. कई अखबारों में मयंक द्वारा लिखे लेख छप चुके हैं. उनकी लेखनी को लोगों द्वारा काफी पसंद भी किया जा रहा है. मयंक एक और किताब पर अभी काम कर रहे हैं. युवा लेखकों के बारे में मयंक कहते हैं कि बीच में एक दौर था जब युवा लेखन से दूर भाग रहे थे, लेकिन बीते कुछ सालों में माहौल में काफी बदलाव आया है.

Anish Bari

स्टार्टअप, आंत्रप्रेन्योर ऐसे लफ्ज हैं, जिसे युवा ज्यादा अपना रहे हैं. युवा आंत्रप्रेन्योर बनना तो चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती है कि वे कैसे एक बेहतर स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं. ऐसी जानकारी से भरी एक पुस्तक अनीश बारी ने लिखी है. उनकी पुस्तक ‘ड्रीम्स ऑफ द मेंगो पीपल’ वर्ष 2014 में आयी थी.

इस पुस्तक में कुछ छोटी-छोटी कहानियां थीं, जिसके जरिये सामाजिक दायरे से निपट कर बेहतर काम करने के तरीके को बताया गया था. इसमें स्पोर्ट्समैन, स्टार्टअप्स, बिजनेसमैन वगैरह की कहानी मिलेगी. उन लोगों का और कुछ घटनाओं का हवाला देकर लोगों को कई बातें समझायी गयी हैं. पुस्तक उस वक्त बेस्ट सेलर रही थी. इसके बाद 2016 में ‘डिकोडिंग स्टार्टअप्स’ पुस्तक उन्होंने लिखी.

यह एक टेक्निकल बुक है. किसी को स्टार्टअप करना है, तो कैसे स्टार्टअप बना सकते है? कस्टमर नीड को कैसे सॉल्व कर सकते हैं? इन बातों की जानकारी डिकोडिंग स्टार्टअप पुस्तक में अनीश बारी ने लिखी है. अनीश फिलहाल एक एजुकेशनल टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं.

 

Shambhavi

रूपा प्रकाशन ने शांभवी की एक बुक पब्लिश की है, जिसका नाम समवेयर टू गो है. पारिवारिक व्यस्तता के कारण इस पुस्तक को लिखने में उन्हें तीन से चार साल लग गये. शांभवी दूसरी पुस्तक भी लिख रही हैं, जो लगभग पूरी है. उस पुस्तक में एक लव स्टोरी है. शांभवी बताती हैं, आजकल मानवता की तरफ लोगों का रुझान कम हो गया है. लोगों का स्ट्रेस इतना बढ़ गया है कि वे खुद की मदद नहीं कर पाते हैं. मेरी पुस्तक ऐसे लोगों को प्रकृति से सीख लेने को प्रेरित करती है. यह पुस्तक असफलता को भूल कर सफलता की राह में लाती है. इसमें शांभवी ने मीडिया में काम करनेवाले एक लड़के की कहानी को दिखाया है.

इसका नाम ऐशिर होता है. वह रिशा से बेहद मुहब्बत करता है, लेकिन काम के तनाव से परेशान ऐशिर सब कुछ छोड़ सुकून की राह में निकल जाता है. बाद में उसे पता चलता है कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है. नकारात्मकता और निराशा से छुटकारा पाये बिना जिंदगी में खुशी नहीं आ सकती है. काफी दिनों बाद ऐशिर वापस आता है. रिशा से मिलकर दुनिया को नये नजरिये से देखने की कोशिश करता है. उनकी इस पुस्तक का विमोचन रविवार को पटना गोल्फ क्लब में किया गया.

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