बिहार के कोशी सीमांचल का इलाका विभिन्न दृष्टिकोण से पिछड़ा हुआ है। उद्योग धंधे तो दूर मूलभूत सुविधाओं का भी घोर अभाव है। इलाके के विकास के लिए सरकारी कार्ययोजना के साथ युवाओं की भूमिका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आज हम ऐसे ही दो युवाओं की बात कर रहे हैं जिन्होंने संसाधनों की कमी के बावजूद लगातार अलग-अलग कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं में नई ऊर्जा एवं जागरूकता लायी।

सहरसा के दो युवा – सोमू आनंद और अभिनव नारायण झा ने अपने दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत कोशी क्षेत्र में जनजागरण का बीड़ा उठाया है। दोनों मिलकर सहरसा में संसद की तर्ज़ पर युवाओं का सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं जिसमें देश की विभिन्न समस्याओं पर युवा अपनी राय रखेंगे। इसका नाम है कोशी कूटनीति शिखर सम्मेलन। इस सम्मेलन से सामने आए विचारों को राज्य एवं केंद्र सरकार को प्रस्ताव के रूप में भेजा जाएगा।

इस बाबत पूछने पर दोनों ने बताया कि आज देश में युवाओं की आबादी सबसे अधिक है राष्ट्रनिर्माण में युवाओं की महती भूमिका है। नीति निर्धारण में युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु संसद की तर्ज़ पर ऐसे आयोजन बड़े शहरों में होते रहते हैं लेकिन ग्रामीण एवं छोटे शहर के युवाओं को अपने विचार प्रकट करने का मंच नहीं मिल पाता था। मन में हमेशा एक टीस रहती थी। जिसे देखते हुए सहरसा में यह कार्यक्रम करने का विचार हुआ। इससे पहले भी अभिनव के नेतृत्व में पटना में युवा संसद आयोजित किया गया था जिसमें विभिन्न जिलों से सैकड़ों युवाओं ने भाग लिया था।

सोमू आनंद लम्बे समय से सहरसा में छात्र-युवाओं के विकास के लिए काम कर रहे हैं। सेमिनार, विभिन्न प्रतियोगिताओं के अलावे फेसबुक ग्रुप के माध्यम से मिलन समारोह आयोजित कर उन्होंने लोगों को चौंका दिया था। सोमू पटना विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र हैं और छोटी सी उम्र में ही अपने हुनर से पूरे मिथिलांचल का दिल जीत लिया। वहीं अभिनव लॉ की पढ़ाई करने के साथ-साथ साहित्य में भी गहरी रुचि रखते हैं। इन्होंने लगातार कई साहित्यिक आयोजन का नेतृत्व भी किया है।

सोमू ने बताया कि शुरुआत में किसी नई योजना पर काम करना बहुत मुश्किल था। लोग जल्दी मानते नहीं थे, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी और छोटे-छोटे कार्यक्रमों से लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई। आज जब ये किसी नई योजना की बात करते हैं तो लोग सहर्ष स्वीकारते हैं एवं सहयोग भी करते हैं।


अपने सफ़र के बारे में सोमू बताते हैं कि बड़े शहरों में संसाधन हैं वहां युवाओं के पास ढेर अवसर होते हैं लेकिन छोटे शहरों की प्रतिभा कहीं दब कर रह जाती है। मैं नहीं चाहता कि जिन परेशानियों का सामना मुझे करना पड़ा वो अन्य युवाओं को करना पड़े। इसके लिए सहरसा जैसे छोटे जगह पर ऐसे आयोजन करवाता रहता हूँ और अब तो लोग भी बहुत ज़्यादा साथ देते हैं। हमारी सफलता इसी बात में है कि अब यहां के लोग जागरूक हो रहे हैं। कल तक बुराई करने वाले लोग भी आज सहयोग करते हैं तो लगता है किसी ने सच ही कहा था “जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है”।

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