पटना: जब जब देश के सबसे ईमानदार नेताओं की बात आती है तब तब लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। शास्त्री एक सीधी, सरल, सच्ची और निर्मल छवि वाले इंसान थे।उनकी ईमानदारी और खुद्दारी की लोग आज भी मिसाल देते हैं।

आज हम शास्त्री से जुड़ा एक किस्सा आपको बताते हैं। बात उस समय की है जब वे बनारस के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई करते थे। इस दौरान उन्होंने साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाले बीकर को तोड़ दिया था। स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्‍हें जोरदार थप्पड़ मार दिया।

बाद में रेल मंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जी जब मंच पर थे, तो देवीलाल उनको देखते ही हट गए। शास्त्री जी ने भी उन्हें पहचान लिया और देवीलाल को मंच पर बुलाकर गले लगा लिया। जन्‍म से वर्मा लाल बहादुर शास्‍त्री जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। इसलिए उन्‍होंने कभी भी अपने नाम के साथ अपना सरनेम नहीं लगाया। उनके नाम के साथ लगा ‘शास्‍त्री’ उन्‍हें काशी विद्यापीठ की तरफ से मिली थी।

बनारस में पैदा हुए शास्‍त्री का स्‍कूल गंगा की दूसरी तरफ था। उनके पास गंगा नदी पार करने के लिए फेरी के पैसे नहीं होते थे। इसलिए वह दिन में दो बार अपनी किताबें सिर पर बांधकर तैरकर नदी पार करते थे और स्कूल जाते थे। कहा जाता है कि शास्त्री फटे कपड़ों से बाद में रूमाल बनवाते थे। फटे कुर्तों को कोट के नीचे पहनते थे। इस पर जब उनकी पत्नी ने उन्हें टोका, तो उनका कहना था कि देश में बहुत ऐसे लोग हैं, जो इसी तरह गुजारा करते हैं।

लाल बहादुर शास्‍त्री, बापू को अपना आदर्श मानते थे। उन्‍हें खादी से इतना लगाव था कि अपनी शादी में दहेज के तौर पर उन्‍होंने खादी के कपड़े और चरखा लिया था।लाल बहादुर शास्‍त्री प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रेल मंत्री जैसे अहम पदों पर थे। एक बार वे रेल की एसी बोगी में सफर कर रहे थे। इस दौरान वे यात्रियों की समस्या जानने के लिए थर्ड क्लास (जनरल बोगी) में चले गए। वहां उन्होंने यात्रियों की दिक्कतों को देखा। उन्‍होंने जनरल बोगी में सफर करने वाले यात्रियों के लिए पंखा लगवा दिया। पैंट्री की सुविधा भी शुरू करवाई।

Source: Live Bihar

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