राजेन्द्र बाबू 12 साल तक भारत के राष्ट्रपति रहे। इस रिकॉर्ड को शायद ही अब कोई तोड़ पाएगा। इतने साल देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद भी उन्होंने अपने लिए धन सम्मपत्ति अर्जित नहीं की। वे 23 मई 1962 को राष्ट्रपति पद से रिटायर हुए। उनके पास रहने के लिए दिल्ली या पटना में कोई अपना घर नहीं था। उन्होंने अपने लिए सरकार से भी कुछ नहीं मांगा। वे पटना आये और कांग्रेस के दफ्तर, सदाकत आश्रम के एक कमरे में अपना डेरा डाल लिया। ये कमरा भी बहुत साधारण था। सीलन से भरा हुआ। एक बार जयप्रकाश नारायण उनसे मिलने के लिए सदाकता आश्रम आये। वे राजेन्द्र बाबू की सादगी को देख कर दंग रह गये। कमरे में सीलन रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी बिहार सरकार से इसकी शिकायत नहीं की। बिहार में तब कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन जयप्रकाश नारायण ने इसका विरोध किया और बात सरकार तक पहुंचायी। जब जाकर राजेन्द्र बाबू के कमरे की मरम्मत हुई।

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