‘शुक्र मनाइए, नीतीश कुमार के राज में हैं, रात दो बजे भी बिना डरे बिहार में टहल लेते हैं’

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पटना: के सिंह मतलब कन्‍हैया सिंह . बिहार के जाने-माने आईआईटी गुरु . केमिस्‍ट्री रग-रग में है . सफर की शुरुआत आरा से हुई . आज देश-दुनिया में कहीं भी चले जाइए, कैंब्रिज से लेकर ऑक्‍सफोर्ड तक, कन्‍हैया सिंह के शिष्‍य मिल जायेंगे . सिंह जिदंगी की सबसे बड़ी कमाई भी देश-दुनिया में नाम रोशन करते अपने शिष्‍यों की सक्‍सेस स्‍टोरी को ही मानते हैं . विजन क्‍लासेज के नाम से के सिंह ने बिहार को पहला व्‍यवस्थित आईआईटी तैयारी संस्‍थान दिया, जिसने कोटा के संस्‍थानों से मुकाबला किया . वे स्‍वयं कोटा तब गए थे, जब कोटा आईआईटी-मेडिकल में जाने वाले छात्रों की तैयारी के लिए निर्मित हो रहा था .

सफलता और शोहरत से कदम मिलाते कन्‍हैया सिंह पहले से नीतीश कुमार से प्रभावित रहे हैं . आजकल जदयू से जुड़ गए हैं . बेबाक कहते हैं – आप इससे इंकार नहीं कर सकते कि आज बिहार में आप रात दो बजे भी कहीं आने-जाने के लिए इसलिए तैयार हो जाते हैं, क्‍योंकि नीतीश कुमार के राज में हैं . दो दिनों पहले कन्‍हैया सिंह लाइव सिटीज के पटना न्‍यूज रुम में थे, जहां उन्‍होंने अपनी जिंदगी के प्रत्‍येक फलसफे की खुली चर्चा की .

तब गनमैन साथ लेकर चलता था बिहार

कन्‍हैया सिंह कहते हैं कि नीतीश कुमार के राजनीतिक आलोचक चाहे जितने बड़े हों, उनसे पूछिए – क्‍या वे 2005 के पहले वाले बिहार में फिर से रहना चाहेंगे . जवाब ईमानदारी से देंगे, तो कहेंगे – बिलकुल नहीं . नीतीश कुमार बिहार में 2005 में मुख्‍य मंत्री बने थे .

2005 के पहले के वर्षों को जेहन में लाते ही कन्‍हैया सिंह सिहर उठते हैं . कहते हैं – तब प्रत्‍येक दिन का सलामत गुजर जाना जिदंगी की सबसे बडी़ उपलब्धि थी . आपने अपने टैलेंट और श्रम से थोड़ा पैसा कमाया – थोड़ी शोहरत अर्जित क्‍या कर ली, गुंडे – मवाली पीछे लग जाते थे . बिना जान-पहचान वाले नंबर से बजने वाली फोन की घंटी डरा देती थी . पीछे से किसी ने तेज हॉर्न मार दिया, तो दिल-दिमाग कांप जाता था . हम सभी टीचर और डॉक्‍टर की जान तो सबसे अधिक खतरे में रहती थी . साथ में, पांच-छह गनमैन लेकर चलना होता था . मजबूरी थी .

बच्‍चों को पढ़ने के लिए गार्जियन सांझ ढलने के बाद भेजना नहीं चाहते थे . क्‍लास में तनिक देरी हुई नहीं कि गार्जियन झगड़ा करने लगते थे . स्‍टडी से अधिक सिक्‍योरिटी की फिक्र थी . बिहार बढ़ता कहां से, और डूबता जा रहा था . कन्‍हैया सिंह कहते हैं – शुक्र मनाइए 2005 में बिहार की बागडोर नीतीश कुमार के हाथों में आ गई . इरादे पक्‍के थे . लॉ एंड ऑर्डर को कंट्रोल करना सबसे बड़ी प्रायोरिटी थी . नतीजा सामने आया .

बकौल कन्‍हैया सिंह – जवाब उनसे पूछिए, जो बात-बात पर नीतीश कुमार की आलोचना करते हैं, वे बताएं कि आज रात को दो बजे भी क्‍या आपको आरा – जहानाबाद – छपरा जाने में भी डर लगता है . ईमानदारी का आंसर है – बिलकुल नहीं . तो फिर ये देन नीतीश कुमार की नहीं तो और किसकी है . हां, कोई भी देश क्राइम फ्री नहीं हुआ है . अमेरिका भी नहीं . वहां भी शूटआउट हो जाते हैं . तो फिर आप अपराधियों से निपटने में सरकार की ईमानदारी को देखिए . नीतीश कुमार न तो अपराध और न ही अपराधी से समझौता करते हैं . कानून अपना काम करता है .

रोड – स्‍कूल – अस्‍पताल को किसने सुधारा

कन्‍हैया सिंह कहते हैं – राजनीति तभी सुधरती है, जब अच्‍छे लोग आते हैं . नीतीश कुमार मुझे अच्‍छे लगे, इसलिए उनके कारवां में जुड़ गया हूं . 2005 के पहले के बिहार को फिर से याद कीजिए . क्‍या सूरत थी बिहार की . आप सड़क में गड्ढ़ा नहीं, गड्ढ़े में सड़क तलाशते थे . लेकिन, आज आप बिहार की सड़कों पर फर्राटा भरते हैं . क्रेडिट नीतीश कुमार को नहीं देंगे तो और किसे देंगे .

पहले स्‍कूलों की बिल्डिंग में भैंस सो रहे होते थे – अस्‍पतालों में कुत्‍तों का डेरा होता था . आज सूरत नहीं बदली है क्‍या . स्‍कूल में टीचर हैं – अस्‍पताल में डॉक्‍टर हैं . आज आप स्‍टैंडर्ड और क्‍वालिटी पर बहस कर रहे हैं . तो जान लीजिए, गुणवत्‍ता में सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है . नीतीश कुमार भी बिना ठहरे लगे रहते हैं . सच को सच ही मानना होगा, क्‍योंकि आज भी बिहार में नीतीश कुमार जैसा कोई दूसरा लीडर नहीं है .

Source: Live Cities News

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