आज बिहार ने एक सोना खोया है, महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह जी का निर्धन 14 नवंबर 2019 को पटना स्वास्थ्य विश्वविद्यालय एवं हॉस्पिटल में हो गया ।
नारायण जी का जन्म : २ अप्रैल १९४२ बिहार के भोजपुर जिला में बसंतपुर नाम के गाँव में हुआ। निधन से पूर्व वे मानसिक बिमारी से पीडित थे और बसंतपुर में ही रहते थे। उन्होंने बर्कली के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से १९६९ में गणित में पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की।
दुनियाभर से चर्चित गणितज्ञों में शुमार किए जाने वाले वशिष्ठ नारायण निधन के बाद भी सरकारी उपेक्षा के शिकार बने और काफी देर तक उनका शव एंबुलेंस का इंतजार करता रहा.

परिजनों के साथ पटना के कुल्हरिया कांप्लेक्स के पास रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह की तबीयत आज सुबह अचानक खराब हो गई. बताया जा रहा है कि आज तड़के उनके मुंह से खून निकलने लगा. जिसके बाद उन्हें तत्काल परिजन पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

परिजनों का आरोप है कि वशिष्ठ नारायण सिंह की मृत्यु के 2 घंटे तक उनकी लाश अस्पताल के बाहर पड़ी रही. 2 घंटे के इंतजार के बाद एबुंलेंस उपलब्ध कराया गया.

गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे. जब वह पीएमसीएच में भर्ती थे तो उनका हालचाल जानने के लिए नेताओं का तांता लगा रहा. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर केंद्रीय मंत्री तक उन्हें देखने गए थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके निधन पर शोक जता चुके हैं.

नारायण जी की जीवनी उतार चढ़ाव से भरी थी,
पटना विज्ञान महाविद्यालय (सायंस कॉलेज) में पढते हुए उनकी मुलाकात अमेरिका से पटना आए प्रोफेसर कैली से हुई। उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो कर प्रोफेसर कैली ने उन्हे बरकली आ कर शोध करने का निमंत्रण दिया। 1963 में वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध के लिए गए। 1969 में उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय में पी.एच.डी. प्राप्त की। चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत पर किये गए उनके शोध कार्य ने उन्हे भारत और विश्व में प्रसिद्ध कर दिया।

निर्धन परिवार से होने और आर्थिक तंगी में जीवन व्यतीत करने वाले सिंह वर्ष 1987 में अपने गांव लौट आए और यहीं रहने लगे। करीब दो साल बाद वर्ष 1989 में वह अचानक लापता हो गये। परिजनों ने उन्हें ढूंढने की काफी कोशिश की लेकिन वह नहीं मिले। करीब चार साल बाद वर्ष 1993 में वह सारण जिले के डोरीगंज में पाये गये थे।

राजधानी पटना के कुल्हड़यिा कॉम्पलेक्स में अपने भाई के एक फ्लैट में गुमनामी का जीवन बिताते रहे महान गणितज्ञ के अंतिम समय तक के सबसे अच्छे मित्र किताब, कॉपी और पेंसिल ही रहे।  सिंह ने अपने जीवन के 44 साल मानसिक बीमारी सिजेफ्रेनिया में गुजारा। उनके बारे में मशहूर किस्सा है कि नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर का कैलकुलेशन एक समान था।

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