जब अश्क के सहारे जीना जिंदगी का तकाजा न रह कर तकदीर बन जाए तो अश्क को भी हाला में बदलते वक्त नहीं लगता। कुछ ऐसा ही हश्र जनता का है जो अपने अरमानों का जनाजा उठते देख भी मौन है, ‘अटल’ मौन! देश में बेरोजगारी बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। देश की दिशा का तो मालुम नहीं लेकिन दशा यह है कि 82 लाख इंजीनियर और स्नातकोत्तरों को रेलवे के ग्रुप डी के  62000 पदों के लिए आवेदन भरना पड़ रहा है। इस मुश्किलात के दो पहलू हो सकते हैं – पहला यह कि जिस रफ्तार से रोजगार उत्पन्न होने चाहिए थे वह नहीं हुए, अब चाहे वह फोर्मल सेक्टर रहा हो या इनफोर्मल सेक्टर। या फिर दूसरा पहलू यह कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ ऐसी खामियाँ हैं जो जरूरी मात्रा में हुनरमंद शिक्षित युवा उत्पन्न करने में नाकाम रही हैं। अगर सरकार के रोजगार मुहैया कराने के दावो को मान भी लिया जाए तो कटघरे में शिक्षा व्यवस्था ही खड़ी नज़र आती है।

वर्ष  2014 में बीजेपी भारी जनादेश के साथ अकेले अपने दम पर 282 सांसदों के साथ लोकसभा में आई थी। आज वर्ष 2019 है, पर जब स्वयं प्रधानमंत्री ‘मजबूर और मजबूत’ सरकार का जिक्र करते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों पर ‘ पॉलिटिकल विलपावर’  दिखाने के लिए न सिर्फ अपने सरकार की पीठ थपथपाते हैं बल्कि बताते भी हैं और जताते भी हैं; तब ये सवाल उठना लाजमी है कि नई शिक्षा नीति लाने में सरकार की ‘पॉलिटिकल विलपावर’ आखिर गई तो गई कहाँ? तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार और सांसदों दोनों को नई शिक्षा नीति का एहसास तब नहीं हुआ। और अगर स्वयं सरकार को पांच वर्ष एक नई शिक्षा नीति की अहमियत का एहसास होने में और उसकी रूपरेखा खींचने में लग जाते हैं तो क्या यह सरकार की नाकामी नहीं मानी जाए?

आईएलओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बेरोजगारी दर 3.5% के आस पास आने वाले कुछ सालों तक बनी रहेगी, लेकिन इस दौरान भी 77% नौकरियां असुरक्षित हैं। लेकिन असली खेल तो आंकड़ों का है! प्रधानमंत्री के लफ़्ज़ों में कहें तो 2014 में उनके 125 करोड़ भाई – बहन थे। पर शायद उनकी लोकप्रियता का असर इतना बढ़ा कि अब 2019 में वही गिनती बड़ कर 133.92 करोड़ हो गई है।3.5% बेरोजगारी दर के हिसाब से यही बेरोजगारी का आंकड़ा वर्ष 2014 में 4.375 करोड़ होता। वहीं आज के समय साल 2019 में उसी 3.5% के दर से लगभग  4.6872 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। आखिर क्यों सरकार का ‘पॉलिटिकल विलपावर’ चाइल्ड पॉलिसी के मुद्दे पर कमजोर पड़ जाता है, या यूं कह लें कि जिक्र भी नहीं आता।

शायद राजनैतिक पार्टियों की यही सच्चाई है कि वह राजनेतिक हैं नैतिक नहीं, अब चाहे वो यूपीए रही हो या आज के दौर में एनडीए। इन नेताओं पर ही शायद तंज कसते हुए राज कुमार साहब ने अपनी फिल्म में ये गाना डाला था  – “छलिया मेरा नाम”

आलेख- आनंद कुमार, भागलपुर

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