UGC द्वारा जारी की गई देश के 24 फर्जी यूनिवर्सिटी की लिस्ट में बिहार का भी कॉलेज

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 24 फर्जी विश्वविद्यालयों की लिस्ट जारी की है. इनमें आठ यूनिवर्सिटी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हैं. जबकि बिहार का एक कॉलेज इस सूची में है. यूजीसी का कहना है कि 12वीं पास कर बच्‍चे अंडर ग्रेजुएट कोर्सों में एडमिशन लेना शुरू करेंगे लेकिन अगर विश्‍वविद्यालय फर्जी निकलता है तो ऐसे में उन्‍हें परेशानी होगी. उनका साल बर्बाद होने का खतरा है. इसके मद्देनजर छात्रों को सावधान करने के लिए यूजीसी ने एकेडमिक ईयर की शुरुआत में ही फर्जी विश्‍वविद्यालयों के नाम सार्वजनिक किए हैं.

आयोग द्वारा जारी नोटिस में कहा गया है, ‘विद्यार्थियों और आम लोगों को सूचित किया जाता है कि फिलहाल देश के विभिन्न हिस्सों में 24 स्वयंभू और गैर रजिस्टर्ड संस्थान यूजीसी अधिनियनम का उल्लंघन करके चल रहे हैं.’ आयोग ने कहा, ‘इन विश्वविद्यालयों को फर्जी घोषित किया गया है और उन्हें कोई डिग्री प्रदान करने का हक नहीं है.’

दिल्ली में फर्जी विश्वविद्यालय कॉमर्शियल यूनिवर्सिटी, यूनाईटेड नेशंस यूनिवर्सिटी, वोकेशनल यूनिवर्सिटी, एडीआर-सेंट्रिक जूरिडिकल यूनिवर्सिटी, इंडियन इंस्टीट्यूशन ऑफ सांइस एंड इंजीनियरिंग, विश्वकर्मा ओपेन यूनिवर्सिटी फोर सेल्फ इम्प्लॉयमेंट, आध्यात्मिक विश्वविद्यालय और वाराणसीय संस्कृत विश्वविद्यालय हैं. वहीं दिल्ली के अलावा बाकी फर्जी विश्वविद्यालय पॉन्डिचेरी, अलीगढ़, बिहार, राउरकेला, ओडिशा, कानपुर, प्रतापगढ़, मथुरा, नागपुर, केरल, कर्नाटक, इलाहाबाद में हैं.

अब सवाल उठता है कि क्या सिर्फ जाली विश्वविद्यालयों की सूची जारी कर देने से हमारी शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी। यदि ये विश्वविद्यालय फर्जी हैं तो उन लाखों छात्रों के भविष्य से खेलने वाले इन विश्वविद्यालयों के प्रबंधन वर्ग से जुड़े लोगों के साथ क्या सुलूक होना चाहिए? क्या इस दिशा में सरकारें कोई पहल कर सकती हैं? इन विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर अब तक जो विभिन्न व्यवसायों, नौकरियों में सेवारत हो चुके हैं, उनके सर्टिफिकेट की विश्वसनीयता पर क्या होना चाहिए? शिक्षा व्यवस्था को लेकर जब भी कोई इस तरह का काला अध्याय खुलता है, उस पर न तो कोई राजनेता बयान देता है, न कोई अधिकारी। जैसे सबको सांप सूंघ जाता है। इसके पीछे सच ये है कि इन्हीं वर्गों से जुड़े लोगों की सह पर देश में धड़ल्ले से इतने बड़े-बड़े कर्मकांड हो रहे हैं।

एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि हम आज भी मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के औपनिवेशिक ढांचे के गुलाम हैं। जो भी दल सत्ता में आता है, वह अपने हिसाब से पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण करवाता है। यह काम पहले मुगलों ने, फिर अंग्रेजों ने, फिर काले अंग्रेजों ने किया। हर राजनीतिक दल शिक्षा के माध्यम से अपनी राजनैतिक विचारधारा को आरोपित कर उन्हें भविष्य के वोट बैंक के रूप में देखता है। डॉ. प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री भारत में जो शिक्षा पद्धति प्रचलित है, उसके कई पक्षों में सुधार की आवश्यकता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक वृहत् जनसमूह को शिक्षित करने का उत्तरदायित्व है।

साधन और संसाधन बहुत सीमित हैं, परिस्थितियाँ भी अनुकूल नहीं। ’सबके लिए शिक्षा’ की सुविधा उपलब्ध करवाना है तो प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह इस लक्ष्य प्राप्ति में सहयोग प्रदान करे। ‘each one teach one’ का नारा इस दिशा में सफलता दिला सकता है। इसके लिए सरकारी तंत्र के साथ स्वयंसेवी और सामाजिक संगठनों को भी जोड़ना होगा। विद्यालयों में संख्यात्मक नामांकन की बढ़ोतरी की बजाय न्यूनतम अधिगम स्तर पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद हमने सबके लिए शिक्षा प्राप्ति पर तो ध्यान दिया, पर सबके लिए समान गुणवत्ता वाली शिक्षा का लक्ष्य अभी भी कोसों दूर है। क्या यह शिक्षा बच्चे को यह स्वतन्त्रता देती है कि वो रमन, टैगोर, कलाम, कल्पना, सुनीता बन सकें? वर्तमान में ज्ञान का विस्फोट तीव्र गति से हो रहा है, किन्तु इस विस्फोट की चुनौती को स्वीकार करने के लिए हमारे देश के विश्वविद्यालयों के स्तर पर ऐसे जाली कारनामों ने एक बार फिर से हमे खबरदार कर दिया है।

यूजीसी की साइट पर मिलेगी पूरी जानकारी

यूजीसी ने उन छात्रों को भी सावधान किया है जो इस समय ग्रेजुएशन कर रहे हैं. उसका कहना है कि छात्रों को एडमिशन से पहले विश्‍वविद्यालय की मान्‍यता के बारे में मालूम कर लेना चाहिए. इसे यूजीसी की साइट https://ugc.ac.in/privatuniversity.aspx पर भी चेक किया जा सकता है, जहां सभी प्राइवेट यूनिवर्सिटी का ब्‍योरा दिया गया है. इसमें किस राज्‍य में कौन सा विश्‍वविद्यालय फर्जी है या कमिशन की शर्तों का उल्‍लंघन कर रहा है उसके पूरा ब्‍योरा दिया गया है.

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