देश के सबसे बड़े चैनल के हेड हैं ये बिहारी, कहते हैं बिहार से मिला आगे बढ़ने का गुण

बिहारी जुनून

उदय शंकर भारत के लोकप्रिय चैनल के प्रमुख हैं। उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से लेकर ‘सत्यमेव जयते’ तक कई यादगार कार्यक्रम तैयार करते हुए टीवी से अमिताभ बच्चन से लेकर आमिर ख़ान तक को जोड़ा है।

छोटे पर्दे का नया भविष्य लिखने वाले उदय शंकर बिहार से गहरा जुड़ाव रखते हैं। बिहार मेरी जन्मभूमि है और शुरुआत में यह मेरी कर्मभूमि भी रही है। मुजफ़्फ़रपुर और पटना इन दोनों जगहों पर मेरा काफ़ी समय बीता है। इन्हीं जगहों ने मुझे गढ़ा है। यह तो सभी जानते हैं कि बिहारी अपने बच्चों को संसार भर के ज्ञान से अवगत कराने में सबसे आगे रहते हैं।

यहां का बच्चा भी राजनीति और समाज की बेहतर समझ रखता है। मेरे साथ भी ऐसा ही था, मैं बचपन से ही मैगज़ीन और अख़बार में देश और दुनिया की राजनीति और करेंट अफ़ेयर्स के बारे में पढ़ता था। वहीं से मेरी सोच विकसित हुई, जिसकी वजह से मैंने यहां तक का सफ़र तय किया है।

हमारा जुझारूपन हमारी सबसे बड़ी ख़ासियत है। परिस्थितियां चाहें कितनी ही बुरी क्यों हों, बिहारी अपने सपने को पूरा करने के लिए राह निकाल ही लेते हैं। इसलिए आज देखें तो देश का कोई कोना हो या कि दुनिया का कोई देश, वहां बिहारी मिलेंगे और कुशल मानव संसाधन के तौर पर देश और दुनिया को विकसित करने में, सुंदर बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हम अक्सर ऐसी कई प्रेरणादायी कहानियां सुनते रहते हैं।

बदलाव तो एक निरंतर प्रक्रिया है, जो हर समय होते ही रहता है। यह चाहता हूं कि बिहार में जो संभावनाएं हैं, सामर्थ्य है, उसका भरपूर उपयोग हो। हां, इसके साथ ही बिहार को अपनी इमेज़ बनानी होगी, इसके लिए हमें सिर्फ़ अपने गौरवशाली इतिहास को ही नहीं, बल्कि अपनी कमज़ोरियों को भी जानना होगा।

एक फ़ेमस लाइन है ना दिल पर लगेगी, तो ही बात बनेगी, तो हमें दिल पर बात लेनी होगी। सिर्फ़ बिहार ही नहीं पूरे देश पर यह बात लागू होती है। हमें अपनी कमज़ोरियों का सामना करना होगा।

शिक्षा को लेकर तो ढेरों प्रयास की ज़रूरत है। मैं बिहार के शहरों की नहीं, बल्कि गांव की बात कर रहा हूं। ग्रामीण शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन की ज़रूरत है। गांव में जो स्कूल हैं, उनमें सुधार लाना होगा और सबसे अहम बात सिर्फ़ किताबों से बच्चों का विकास नहीं हो सकता है।

लाइब्रेरी हों, संगीत केंद्र हों, सिनेमा थिएटर हों, खेल के मैदान हों ताकि सर्वांगीण विकास हो। एक-एक चीज़ का फ़र्क़ पड़ता है। और इसके लिए सिर्फ़ सरकार को ही ज़िम्मेदार मानकर समाज को भी अपनी तरफ़ से इसे बेहतर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

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