बिहार में है नालन्दा विश्वविद्यालय से भी पुराना विश्वविद्यालय, जान हर बिहारी को होगा गर्व

इतिहास

नालंदा में शुरुआत से ही एक से बढकर एक शिक्षा का केन्द्र रहा है। नालंदा में कई ऐसे संस्थान है जिसके बारे में आज भी बिहार और भारत के लोग इससे अनजान हैं। जानकर हैरानी होगी कि विश्व गुरु कहे जाने बाले नालंदा में एक से बढकर एक शिक्षा का केन्द्र पूर्व काल से ही रहा है।

राज्य के सबसे प्राचीन विश्वाविद्यालय नालंदा विश्वाविद्यालय से भी पुराना है तेल्हाड़ा विश्वाविद्यालय। पिछले दिनों सुचना एवं जनसम्पर्क पदाधिकारी नालन्दा लाल बाबू सिंह, जिला भूअर्जन पदाधिकारी नालन्दा सुबोध कुमार सिंह, लोकप्रिय कवि कुमार राकेश ऋतुराज और शिक्षाविद राकेश बिहारी शर्मा ने विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक तेल्हाड़ा विश्विद्यालय के एक–एक जगह को देखा।

तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय नालन्दा विश्वविद्यालय से भी प्राचीन है वर्त्तमान समय में इसका अभी यह पूरा उत्खनन नहीं किया गया है। इसका उत्खनन पूर्ण होते ही भारत का एक और गौरवपूर्ण इतिहास सामने आएगा विश्व पटल पर सब के सामने आएगा।

इतिहासज्ञ जिला भूअर्जन पदाधिकारी श्री सुबोध कुमार सिंह ने लोगों को बताया कि बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की कड़ी में एक और नया नाम जुड़ा है तिलाधक महाविहार जो नालंदा जिले के एकंगरसराय प्रखंड के तेल्हाड़ा में है यहाँ पर चल रही खुदाई में प्राप्त अवशेषों के आधार पर यहां तिलाधक महाविहार नामक प्राचीन शिक्षा केंद्र हुआ करता था।

सातवीं सदी में भारत भ्रमण पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में इस स्थान का जिक्र मिलता है। उन्होंने कहा कि 5वीं सदी यानि “गुप्त काल” से 12वीं सदी “पालवंश” के शासनकाल तक यहां यह प्रसिद्ध महाविहार, जो बौद्ध साधकों के शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

यह विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय के समकालीन विश्वविद्यालय था इसे भी बख्तियार खिलजी के द्वारा जलाए जाने के प्रमाण मिलते हैं, जो की उत्खनन के क्रम में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य मिल रहे हैं जो सामने दिख रहा है। देखने से एसा लगता है की इसे पूरा जलते रहने के लिए छोड़ दिया गया था। उत्खनन में जले हुए अनाज के अवशेष एवं दीवारों पर जलने के काले–काले साक्ष्य मौजूद हैं, जो की इस बात की गवाही दे रहा है।
चल रहे उत्खनन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहां पर तीन बौद्ध मंदिर क्रमवार से इस बौद्ध विहार का ऊपरी छत या सतह का निर्माण पाल वंश के शासनकाल यानि आठवीं से बारहवीं सदी एवं नीचे की सतह का निर्माण काल पांचवीं सदी का है एसा देखने से प्रतीत होता है। यह विश्वविद्यालय करीब 1600 साल पुराना है. बिहार में इससे पहले नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय मिले थे और अब इस नए विश्वविद्यालय मिलने के बाद इनकी संख्या तीन हो गई है।

खुदाई से पता चला है कि यहां पर शिक्षकों के रहने के लिए कमरे भी बनाए गए थे और पढने के लिए क्लासरूम भी बनाए गए थे 1000 (एक हजार )बौद्ध भिक्षु यहां रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे। तिल्हाडा विश्वविद्यालय को उच्च शोध वाले विश्वविद्यालय के रूप में या फिर नालंदा विश्वविद्यालय जो कि प्राचीन काल में पूरे विश्व के बौद्ध विद्वानों के लिए ज्ञान हासिल करने का केंद्र था।


उन्होंने कहा कि तेल्हाडा में 3 बौद्ध मंदिरों के अवशेष मिले हैं और इनका भी जिक्र इत्सिंग के विवरणी में किया गया है। उन्होंने बताया कि उक्त विवरणी में करीब एक हजार बौद्ध भिक्षुओं के एक बड़े चबूतरे पर एक साथ बैठकर प्रार्थना करने का भी जिक्र है जिसे भी यहाँ खुदाई के दौरान चिंहित किया गया है। लेकिन अब इतिहास का एक नया अध्याय खुल गया है उत्खनन से प्राप्त पाली लिपि में सील पर अंकित अक्षरों को पढ़कर तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का नाम तिलाधक, तेलाधक्य या तेल्हाड़ा नहीं बल्कि श्री प्रथम शिवपुर महाविहार है।

उन्होंने बताया कि सीलें जिन पर तिल्हाधक महाविहारा लिखा है जिसकी पुष्टि होती है यह बौद्ध महाविहारा लगभग एक किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है यहाँ पर उत्खनन 2009 में शुरू किया गया था जो खुदाई का काम आज भी जारी है लेकिन अभी कुछ समय से खुदाई बंद कर दिया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुदाई कार्यों की प्रगति के बारे में जानने के लिए कई बार उक्त स्थल का भ्रमण करते रहते रहे हैं।

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