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कहते हैं कि बच्चे को बचपन में जिस नाम से पुकारते हैं वह गुण उसमें समाहित हो जाता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया गोपालगंज की आयरन देवी ने। पति की असमय मृत्यु से विचलित हुए बिना आयरन ने संघर्ष कर अपने 4 पुत्रों को मुकाम हासिल कराया। बड़े पुत्र हरेन्द्र फिलवक्त पूर्णिया में वाणिज्य कर अधिकारी हैं।

आंदर प्रखंड के खेमराज पडरी गांव के एक अनुसूचित जाति के परिवार में जन्मी आयरन की शादी 1962 में सिसवन के एक छोटे से गांव नवलपुर में हुआ। तब पति बेरोजगार थे व ससुर के सूअर पालन के धंधे से घर -गृहस्थी की गाड़ी चलती थी। चूंकि आयरन के 5 भाई रेलवे में नौकरी करते थे।

तब आयरन ने पति को मैट्रिक से आगे की पढाई के लिये छपरा भेजा व उनके पढाई के खर्चे के इन्तजाम के लिये खेतीबारी व मजदूरी की।1975 में पति को रेल में क्लर्क की नौकरी मिल गयी। तब परिवार की गाड़ी ठीक ठाक चलने लगी।इसी दौरान 1992 में जूठन मांझी की बीमारी के चलते मौत हो गयी।आयरन के समक्ष 5 पुत्रों की तालीम दिलवाने की जिम्मेवारी टूट पड़ी। तब आयरन के फौलादी इरादे सामने आये।

भार नदी तैर कर ही विद्यालय चले जाते थे। बड़े बेटे को 1995 में टीचर की नौकरी मिली। लेकिन आयरन को इससे संतोष न था। वह बेटे को बड़े कार्य के लिये प्रेरित करती रही। तब बेटे ने बीपीएससी की सचिवालय सहायक व 2010 में वाणिज्य कर सहायक की नौकरी हासिल कर ली। वहीं पुत्रवधू टीचर और अन्य बेटों ने पुलिस व रेल की नौकरी हासिल कर ली। आज आयरन का संघर्ष व उसके परिवार की सफलता इलाके में उदाहरण पेश करती है।

आयरन सिर्फ नाम लिखती हैं। लेकिन बच्चों को पढ़ा लिखा कामयाब बना दिया। बड़ा बेटा हरेन्द्र अधिकारी है। अजय रेलवे तथा प्रदीप व संदीप बिहार पुलिस में हैं। वही छोटा बेटा पटना में सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा है। आयरन की प्रेरणा से पड़ोसी गांव बखरी के ट्रैक्टर चालक जगजितंन बैठा व किसान राजदेव भगत तथा उबाधी निवासी अक्षयलाल यादव ने अपने बेटों को बैंक पीओ बनाया।

 

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