पटना: कारगिल युद्ध में शरीर में 17 गोलियां समा चुकी थीं। सभी 20 साथी शहीद हो चुके थे, लेकिन परमवीर योगेंद्र सिंह यादव का जज्बा नहीं डिगा। डिगता भी कैसे नस-नस में भरा देशप्रेम उन्हें साहस दे रहा था। उन्होंने अकेले ही पाकिस्तानी सैनिकों से जंग लड़ी और उन्हें मात देकर टाइगर हिल पर पाकिस्तान के तीन बंकरों पर कब्जा किया।

जिस मुश्किल हालात में उन्होंने जंग लड़ी वह गाथा सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनकी वीरता को सलाम किया गया और उन्हें परमवीर चक्र मिला। योगेंद्र सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र से अलंकृत होने वाले योद्धा हैं। साहिबाबाद के लाजपत नगर में रहने वाले योगेंद्र सिंह यादव की वीरता का जब भी जिक्र होता है उनके परिवार का सिर फक्र से ऊंचा हो जाता है। योगेंद्र अभी बरेली में सूबेदार मेजर पद पर तैनात

विपरीत थे हालात 

योगेंद्र बताते हैं कि हालात बहुत विपरीत थे। 16500 फुट ऊंची टाइगर हिल बर्फ से ढकी थी। तापमान -30 डिग्री सेल्सियस था। बर्फीले तूफान के बीच पहाड़ी पर चढ़ना आसान नहीं था। पाकिस्तानी सेना ऊंचाई पर थी। दिन में चढ़ते तो दुश्मन देख लेता और आसानी से गोली का शिकार बना लेता। वह और उनके बीस साथियों ने रात में बर्फीले तूफान को चीरते हुए पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की।

रात में दुश्मनों की तरफ बढ़ते और दिन में छिप जाते। हम लगातार दो रात चले। तीसरी रात की सुबह हमारा दस्ता टाइगर हिल की चोटी के पास था। इस दौरान पाकिस्तानी सेना ने हमें देख लिया। दस्ते पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलियों की बौछार कर दी। भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तानी सेना के कई सैनिकों को मार गिराया।

योगेंद्र ने बताया कि हम लड़ाई लड़ते हुए हिल पर चढ़ गए। इस दौरान 14 साथी शहीद हुए। कुल सात लोग ही हिल पर पहुंचे। वहां पहुंचते ही दुश्मनों ने ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू कर दी। उनसे लड़ते हुए छह जवान घायल हो गए। योगेंद्र अपने साथी को चिकित्सीय सेवा दे ही रहे थे कि इसी दौरान दुश्मन की गोली उनके दोस्त के भेजे को पार करती हुई निकल गई।

योगेंद्र को भी कई गोलियां लगीं। ग्रेनेड का एक हिस्सा पैर में लगा। उन्हें लगा कि उनका पैर कट गया है। वह जख्मी होकर गिर पड़े, लेकिन उन्हें विश्वास था कि जब तक सीने या सिर में गोली नहीं लगेगी तब तक वह जीवित रहेंगे।

सीने में मारी गोली

पाकिस्तानी सैनिक उनके पास पहुंचे और शहीद हुए जवानों पर गोलियां दागीं। योगेंद्र पर भी गोलियां चलाईं। उनके हाथ और पैरों में गोलियां मारीं। इसके बाद सीने में गोली चलाई, लेकिन जेब में रखे पांच रुपये के सिक्कों ने उनकी जान बचा ली। दर्द बहुत था, लेकिन दुश्मनों के सामने ऐसे लेटे रहे मानों शरीर में प्राण नहीं है। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक योगेंद्र व उनके साथियों के हथियार लूट ले गए।

योगेंद्र ने बताया कि 17 गोलियां लगने के बाद वह बेहोश हो रहे थे। कुछ दिख नहीं रहा था, तभी एक पाकिस्तानी सैनिक का पैर उनके पैर से टकराया तो उन्हें अहसास हुआ की वह जिंदा हैं। उन्होंने सोचा कि अब तक जीवित हूं तो जिंदा ही रहूंगा। मौत में भी कहां हिम्मत थी कि वह इस देशभक्त योद्धा को छू ले। योगेंद्र बताते हैं कि दुश्मनों ने नीचे मेरी पोस्ट पर हमला करने की रणनीति बनाई थी। उनकी आवाज जब मेरे कान पर पड़ी तो मुझे लगा कि मेरी टुकड़ी खत्म हो जाएगी। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि इतनी शक्ति दे दे कि मैं अपने साथियों तक सूचना पहुंचा सकूं। योगेंद्र उठ खड़े हुए और ठान लिया कि लड़ूंगा और दुश्मनों को मारूंगा।

पाक के कई सैनिकों को उतारा मौत के घाट

योगेंद्र बताते हैं कि भारतीय सैनिकों के हथियार लूटकर जा रहे पाकिस्तानी सैनिकों पर उन्होंने ग्रेनेड फेंका। इससे कई पाक सैनिकों की मौत हो गई। जो बचे वे भागकर छिप गए। उन्हें लगा कि भारतीय सेना आ गई है। योगेंद्र के पास पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार आ गए। उनका बायां हाथ और दोनों पैर गोलियों से छलनी हो चुके थे। उन्होंने अपना हाथ उखाड़कर फेंकने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद हाथ को पीठ पर टिका दिया और लेटकर एक हाथ से हथियार चलाने लगे। जान पर खेलकर पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा। उन्होंने पाकिस्तान के तीन बंकरों पर कब्जा किया।

दुश्मनों की लोकेशन के बारे में दी जानकारी 

पाकिस्तानी सैनिकों की सूचना हासिल करने के लिए काफी आगे तक गए। उन्होंने जब लोकेशन देख ली तो उसके बाद एक नाले के सहारे नीचे अपनी पोस्ट के पास पहुंचे। उन्होंने टाइगर हिल पर दुश्मनों की लोकेशन के बारे में पूरी जानकारी दी। इसके बाद वह बेहोश हो गए और जब होश आया तो अस्पताल में भर्ती थे। उनसे मिली जानकारी के आधार पर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना पर हमला कर टाइगर हिल पर फतह हासिल की। योगेंद्र करीब 16 महीने तक अस्पताल में रहे। कारगिल युद्ध को याद कर योगेंद्र की आंखें इस वजह से नम हो जाती हैं क्योंकि वह इस युद्ध में अपने साथियों को बचा नहीं सके थे।

अचानक बदली रणनीति  

योगेंद्र सिंह यादव जब कारगिल युद्ध के बारे में बताते हैं तो उनकी भुजाएं फड़कने लगती हैं, चेहरे पर चमक और आवाज बुलंद हो जाती है। वह बताते हैं कि टाइगर हिल पर ऑपरेशन के लिए हमें तीन-चार दिन तक ही रिहर्सल का समय मिल पाया था। उस दुर्गम पहाड़ी पर दिन में नहीं चढ़ा जा सकता था। आगे बढ़ते समय पहाड़ी पर एक संकीर्ण रास्ता भी आया, जिसमें सिर्फ रस्सी के सहारे ऊपर जा सकते थे।

जब हम रस्सी के सहारे जाने लगे तो दोनों तरफ से दुश्मनों के बंकर से फायरिंग शुरू हो गई। इसके बावजूद हम सात जवान ऊपर चढ़ गए। अंधाधुंध फायरिंग कर दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया। वहां हम एक कदम आगे रखते तब भी मौत थी और पीछे रखते तब भी मौत थी, लेकिन भारतीय फौजी कभी भी अपने कदम पीछे नहीं हटाता है। उसके कदम हमेशा दुश्मन की ओर बढ़ते हैं। हम आगे की तरफ भागे।

उफ तक नहीं करूंगा

पांच घंटे तक लगातार फायरिंग की। जब बहुत कम मात्रा में हथियार बचे तो हमने रणनीति बनाई। एकदम से शांत हो गए और दुश्मन का इंतजार करने लगे। दिन के करीब बारह बजे पाकिस्तान के ग्यारह से बारह सैनिक देखने आए कि भारत के कितने जवान बचे हैं। वे जैसे ही दिखे हमने एक साथ हमला बोला और उन्हें मौत के घाट उतार दिया। एक बच गया और उसने दुश्मन को जानकारी दे दी। इसके बाद तीस से पैंतीस पाक सैनिकों ने दोबारा हमला किया। ऊपर से पत्थर फेंके। हमारे कई साथी शहीद हो गए। उनके लिए मैं भी मर चुका था, लेकिन मैंने सोच लिया था कि मैं उफ तक नहीं करूंगा।

हम जीतना चाहते थे और जीते भी

जंग को याद करते हुए योगेंद्र बताते हैं कि हमने 12 जून को तोलोलिंग पहाड़ी कर कब्जा किया। इसके बाद टाइगर हिल की चुनौती थी। हमने अपने जज्बे और साहस से दुश्मनों को मात देकर टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया। हम जीतना चाहते थे और जीते भी। इस पावन मिट्टी में जन्मे उन सभी योद्धाओं को मेरा नमन है। जिन्होंने हिंदुस्तान की मिट्टी के लिए जान न्यौछावर कर दी, उन सबका सम्मान होना चाहिए। गुरु गोविंद सिंह ने कहा है- देहु शिवा वर मोहे, शुभकरमन तें कबहूं न टरूं, न डरूं अरसौं जब जाए लडूं निश्चय कर अपनी जीत करूं।

ईश्वर ने मातृभूमि की सेवा करने का अवसर दिया

परमवीर योगेंद्र सिंह यादव कहते हैं कि व्यक्ति की पहचान पद और ओहदे से नहीं उसके कर्म से होती है। मैं कोई विशेष शक्तियां लेकर जन्मा इंसान नहीं हूं। आप जैसा सामान्य इंसान हूं। केवल फौजी ही नहीं हर वह व्यक्ति सैनिक है, जो देश के लिए कुछ कर रहा है। चाहे वह पुलिस में हो, चाहे सेना में या फिर सामान्य नागरिक ही क्यों न हो। मुझे ईश्वर ने मातृभूमि की सेवा करने का अवसर दिया। शादी के बाद ही मैं वापस जम्मू-कश्मीर पहुंच गया। मेरी बटालियन 18 ग्रेनेडियर्स कारगिल में मोर्चा संभाल चुकी थी। मुझे पहला टास्क तोलोलिंग पहाड़ी को कैप्चर करने का मिला।

सबसे कम उम्र में मिला सबसे बड़ा शौर्य सम्मान

10 मई 1980 को जन्मे योगेंद्र सिंह यादव सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले योद्धा हैं। महज 19 साल की उम्र में जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में अप्रतिम शौर्य दिखाया था। इसके लिए उन्हें जनवरी 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने परमवीर चक्र से अलंकृत किया।

रूहेलखंड विश्वविद्यालय देगा डीलिट् की मानद उपाधि

बरेली स्थित रूहेलखंड विश्वविद्यालय ने परमवीर योगेंद्र सिंह यादव को डीलिट् की मानद उपाधि देने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय में चार सितंबर को होने वाले दीक्षा समारोह में उन्हें यह उपाधि दी जाएगी।

खून में रची-बसी है देशभक्ति

योगेंद्र के पिता करन सिंह यादव भी सेना में थे। उनके पिता ने 1965 और 1971 में पाकिस्तानी सेना से जंग लड़ी। बड़े भाई जितेंद्र यादव भी सेना में हैं। योगेंद्र को पिता जी से प्रेरणा मिली और 16 महज साल पांच माह की उम्र में भारतीय सेना में पहुंच गए। वर्ष 1999 में उनकी शादी हुई। उनकी पत्नी गर्भवती थीं तभी मुख्यालय से पत्र आया। वह बिना देर किए घर से निकल गए। जम्मू पहुंचे तो पता चला कि कारगिल जाना है और उन्हें युद्ध में शौर्य दिखाने का मौका मिला।

21 जांबाजों को मिल चुका है परमवीर चक्र

अब तक सेना के 21 जांबाजों को परमवीर चक्र से अलंकृत किया जा चुका है। इनमें से योगेंद्र सिंह यादव सूबेदार मेजर और संजय कुमार सूबेदार के तौर पर सेना में सेवा दे रहे हैं। मानद कैप्टन बन्ना सिंह वर्ष 2000 में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त कराने में अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया था।

Source: Dainik Jagran

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