श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने बनवाया था पटना का उलार सूर्य मंदिर, छठ में क्यों जुटती है लाखों की भीड़?

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देश के प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों में ज्यादातर सूर्य मंदिर बिहार में हैं। बिहार के पटना जिला दुल्हिन बाजार के उलार सूर्य मंदिर को उसी शृंखला की एक कड़ी माना जाता है। उलार को द्वापरयुगीन सूर्य मंदिर माना जाता है। मंदिर और उसके आसपास पुरातात्विक महत्व की कई चीजें हैं, जो मंदिर की गौरवशाली अतीत को बयां करती हैं। छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

यहां सूर्य नारायण की दुर्लभ मूर्ति और प्राचीन तालाब है। श्रद्धालु इसी सरोवर में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। उलार सूर्य मंदिर कुष्ठ से मुक्ति के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि पांच रविवार तालाब में स्नान करने से असाध्य कुष्ठ रोग से भी लोगों को छुटकारा मिल जाता है।

कई राज्यों से आते हैं श्रद्धालु

वैसे तो, यहां वर्षभर लोग आते-जाते रहते हैं, लेकिन छठ के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बिहार के अलावा सीमावर्ती झारखंड और पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश के श्रद्धालु भी पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बताया जाता है कि आम दिनों में गैर हिन्दू भी कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए तालाब में स्नान के लिए पहुंचते हैं। यह सामाजिक सद्भाव की भी मिसाल है।

लोककथाओं और किवंदितियों में कई राजा- महाराजाओं द्वारा मंदिर में सूर्य उपासना कर मन्नत मांगने के बाद संतान प्राप्ति का जिक्र है। चैती हो कार्तिक, दोनों छठ पर यहां लाखों की भीड़ जुटती है। कहा गया है कि सच्चे मन से जो नि:संतान सूर्य की उपासना करते हैं उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। पुत्र प्राप्ति के बाद मां द्वारा आंचल में पुत्र के साथ नटुआ व जाट-जटिन के नृत्य करवाने की भी परंपरा है।

क्या है धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को गोपियों ने भ्रमवश श्रीकृष्ण मान लिया था। साम्ब गोपियों को अपनी पहचान बताने के बजाय गोपियों की लीला में शरीक हुए थे। इसके बाद श्रीकृष्ण ने श्राप दे दिया था, जिसके बाद साम्ब कुष्ठ रोगी हो गए थे। साम्ब ने जब श्रीकृष्ण से मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तब उन्हें 12 सूर्य मंदिरों का निर्माण कराने को कहा गया था।इसके बाद शाम्ब ने उलार्क (अब उलार), लोलार्क, औंगार्क, देवार्क, कोर्णाक समेत 12 स्थानों पर सूर्य मंदिर बनवाए। इसके बाद उन्हें श्राप से मुक्ति मिली। बाद में उलार मंदिर को भी मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त कर दिया। फिर 1950-54 में संत अलबेला बाबा ने जन सहयोग से मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया। उस समय खुदाई में काले पत्थर की पालकालीन खंडित मूर्तियां भी मिली। बाद में इन खंडित मूर्तियों की भी पूजा होने लगी।

 

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