लाल, नीले, गुलाबी रंगों से होली (Holi 2020) तो पूरी दुनिया में खेली जाती है. पर ब्रज की होली (brij ki holi) बहुत ही खास होती है. फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाने वाली ब्रज की होली का अंदाज काफी अनोखा होता है. ब्रज के बरसाना और नंदगांव की होली में देश ही नहीं दुनिया के कोने-कोने से लोग हिस्सा लेने के लिए आते हैं.


नारी सशक्तिकरण का प्रतीक है ब्रज की होली

पूरी दुनिया से अलग ब्रज की लट्ठमार होली सिर्फ मौज मस्ती की नहीं बल्कि नारी सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण महिला शक्ति का सम्मान करते थे और बुरे वक्त में सदैव उनके साथ खड़े होते थे. लट्ठमार होली श्रीकृष्ण के उसी संदेश को नटखट अंदाज में प्रदर्शित करती है. लट्ठमार होली में महिलाएं अपनी ताकत का प्रदर्शन करती हैं. मथुरा और बरसाना की लट्ठमार होली में आज भी राधा-कृष्ण की अनोखी विरासत सिमटी हुई है.


नंदगांव और बरसाने के बीच खेली जाती है लट्ठमार होली

बरसाने की हुरियारिनों और नंदगांव के हुरियारों के बीच लट्ठमार होली होती है. इसमें महिलाएं पुरुषों पर लट्ठ बरसाती हैं. पुरुष सिर के ऊपर छतरीनुमा चीज रखकर बचाव करते हैं. इससे पहले हुरियारे नंदबाबा मंदिर में आशीर्वाद के बाद पताका लेकर निकलते हैं और वहां से हुरियारे पीली पोखर पहुंचते हैं. साज-सज्जा और ढाल कसने के बाद रसिया गाते हैं, फिर लाड़िली जी मंदिर की ओर बढ़ जाते हैं. दर्शन के बाद वापसी में रंगीली गली में लट्ठमार होली खेली जाती है.


न्यौता लेकर जाती हैं सखियां

राधा-कृष्ण की परंपरा को अपनाते हुए आज भी फाल्गुन मास की सप्तमी को राधा रानी के गांव बरसाने से सखियां फाग खेलने का न्यौता लेकर नंदगांव जाती हैं. न्यौता पहुंचने के बाद हुरियार ढाल लेकर होली खेलने के लिए बरसाने पहुंचते हैं. वहीं, दूसरी तरफ बरसाने की महिलाएं रंग, लट्ठ लेकर होली खेलने की तैयारी करती हैं. नंदगांव की टोलियां जैसी ही बरसाने पहुंचती हैं महिलाएं उन पर लाठियां बरसाना शुरू कर देती हैं. बरसाने और नंदगांव दोनों ही तरफ के लोगों को आज भी इस बात का विश्वास है कि लट्ठमार होली में किसी को भी चोट नहीं पहुंचती है. बरसाने की होली में शामिल होने के बाद हर कोई श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम में रंग जाता है.

Sources:-News18

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here