गंगा-गंडक के संगम स्थल पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगने वाला सोनपुर का मेला अपने आप में रोमांच पैदा करता है. इस रोमांच का ख़ास पहलु हैं यहां लाये जाने वाले उन्नत नस्ल के पशु-पक्षी.

सोनपुर मेले के पौराणिक महत्त्व में भी हाथी का ख़ास स्थान है. यह गज-ग्राह यानी हाथी और मगरमच्छ के लड़ाई की भूमि भी है, जिसमे हाथी मुश्किल स्थिति में अपने आराध्य भगवान विष्णु को याद किया और भगवान विष्णु ने हाथी की रक्षा की थी. बदलते समय के साथ न सिर्फ सोनपुर मेला का स्वरूप बदला बल्कि हाथी बाजार के रूप में भी परिवर्तन दिखा.

पुराने जमाने में राजे-राजवाड़े यहां अपनी सेना के लिए हाथी खरीदने आते थे. उस ज़माने में सोनपुर मेले के हाथी बाजार की रौनक देखने लायक होती थी. समय के साथ स्थितियां बदली और अब न तो सैन्य कारण से और न ही व्यावसायिक कारण से हाथी की उपयोगिता रह गई. इसके बावजूद सोनपुर मेले में हाथी की खरीद बिक्री होती थी और हाथी बाजार का रौनक बरकरार रहा.

वन्य जीव संरक्षण कानून लागू होने की वजह से हाथियों की खरीद-बिक्री पर रोक लग गई. फिर भी सोनपुर मेले में पर्याप्त संख्या में हाथी आने का सिलसिला जारी रहा. हाथी की खरीद-बिक्री बंद होने पर भी यह गुप्त रूप से जारी रहा. हाथी मालिक के साथ खरीददार दान का शपथ देकर इसे जारी रखे रहे. यानी हाथी मालिक हाथी पालने में असमर्थ बताकर इसे दान स्वरूप दूसरे को दे देते थे, लेकिन अंदरखाने इसकी बिक्री हो जाती थी.

समय के साथ सख्ती बढ़ती गई और मेले में हाथियों की संख्या घटने लगी. लेकिन हाथी बाजार का क्रेज बरकरार था. बच्चो से लेकर बुजुर्गों तक में हाथी बाजार ख़ास आकर्षण का केंद्र बना रहा. कोई यहाँ फोटो खिंचाने तो कोई दर्शन करने और कोई इसकी भाव भंगिमा को निहारने यहां आते थे. लेकिन पिछले दो वर्षों से हाथी बाजार से हाथी नदारत हो गए. मेला जैसे अपना सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण खो दिया. इसकी कमी न सिर्फ स्थाई लोगों ने बल्कि प्रशासन ने भी महसूस की. हाथी बाजार में हाथी के न आने से सोनपुर मेले में विदेशी पर्यटकों की संख्या में भी गिरावट आने लगी. इसबार प्रशासन ने ख़ास पहल कर हाथी मालिकों से हाथी लाने का निवेदन किया और इस बार मेले में हाथियों की उपस्थिति से मेले की रौनक लौट आई है.

Sources:-Zee News

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