बिहार ने कभी किसी भी छेत्र में देश को गौरान्वित करने का मौका नहीं छोड़ा है पर बिहार में हुनरमंद लोगों की इज़्ज़त उनके कला अनुसार नहीं होती बीते 14 नवंबर को महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण जी के पार्थिव शरीर के साथ वैसा लापरवाही के सलूक का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अब एक और मार्मिक मामला सामने आया है जिसमें प्रदेश का एक राष्ट्रीय स्तर का तैराक पटना की सड़कों पर चाय बेचकर गुजारा कर रहा है. खास बात ये कि उन्होंने अपनी चाय की दुकान का नाम भी ‘नेशनल तैराक टी स्टॉल’ रखा है.

पटना के काजीपुर मोहल्ले में चाय की दुकान चला रहे गोपाल यादव एक समय अंतरराष्ट्रीय स्तर के तैराक बनना चाहते थे, लेकिन अब अपनी खराब आर्थिक व्यवस्था के कारण चाय बेचने को मजबूर हैं ताकि अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें. चाय की दुकान का नाम ‘नेशनल तैराक टी स्टॉल’ रखने के बारे में जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने यह नाम क्यों रखा है तो उन्होंने कहा कि यह राज्य के सभी एथलीटों की दुर्दशा बताने के लिए किया है.

बता दें कि 1987 में गोपाल ने बिहार की तरफ से पहली बार कोलकाता में हुई राष्ट्रीय तैराकी प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया था.. इसके बाद 1988 और 1989 में केरल में आयोजित राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता में बढ़िया प्रदर्शन किया. 1988 में बीसीए दानापुर में आयोजित राज्य चैंपियनशिप में 100 मीटर बैकस्ट्रोक प्रतियोगिता में पहले नंबर पर आए.इसके बाद 1990 में वह डाक विभाग में नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दिया, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली.

बकौल गोपाल उन्होंने कई जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन सभी को रिश्वत चाहिए थी, जिसकी वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई.

उन्होंने बताया कि उनके बच्चे भी तैराकी करना चाहते हैं और उनमें काफी प्रतिभा है, लेकिन उन्होंने मेरी स्थिति देखकर तैराकी छोड़ दी. गोपाल ने बताया कि उन्होंने अपने अंदर के तैराक को जिंदा रखा है, इसलिए अब गंगा नदी में तैराकी सिखा रहे हैं. बहरहाल गोपाल की स्थिति को देखते हुए इस बात का पता चलता है कि देश में एथलिटों की क्या दशा है.

गोपाल प्रसाद ने 1987, 88, 89 और 90 में लगातार राज्य चैम्पियनशिप में बेहतर प्रदर्शन किया. इन्हें बाद में सीनियर राष्ट्रीय तैराकी में भाग लेने वाली बिहार की टीम में शामिल किया गया. इस टीम में भी गोपाल प्रसाद ने बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वक्त के साथ इनकी आर्थिक स्थिति ख़राब होती चली गई. गोपाल प्रसाद ने खूब कोशिश की लेकिन उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली.

स्पोर्ट्स कोटे से अप्लाई भी किया. नौकरी के लिए पोस्टल विभाग से लेकर कई जगह साक्षात्कार दिए, लेकिन प्रतिभा पर पैरवी भारी पड़ गई और बेरोजगारी झेलना गोपाल प्रसाद की नियती बन गई. गोपाल प्रसाद अब सरकारों से अपनी स्थिति सुधारने और खिलाड़ियों को सम्मान देने की गुहार लगा रहे हैं.

गोपाल प्रसाद के बेटे भी तैराकी में माहिर हैं, लेकिन जब भी वे स्विमिंग में करियर बनाने की सोचते हैं तो पिता की हालात देखकर सहम जाते हैं. नतीजा यह हुआ कि आगे बढ़ने की उम्र में गोपाल प्रसाद के बेटे सनी एक प्रिंटिंग प्रेस में मामूली नौकरी कर रहे हैं. ज़ी मीडिया की टीम ने जब सनी से बात की तो उन्होंने बताया कि 5-6 हज़ार महीने के लिए उन्हें घंटों काम करना पड़ता है. लेकिन उनके पास इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सन्नी कहते हैं कि पसीना बहाने वाले खिलाड़ियों को वो सम्मान नहीं मिलता, जिसके वे हकदार होते हैं.

कभी नदी और तालाब के सीने को चीरने का साहस रखने वाले गोपाल प्रसाद अपनी जिंदगी की नाव को हालात के झंझावात से नहीं निकाल पा रहे हैं. व्यवस्था के कुचक्र और आश्वासन के भंवर में उनकी जिंदगी हिचकोले खा रही है. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक से उन्होंने नौकरी की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें काम नहीं मिला. गोपाल प्रसाद ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. ये उम्मीद बिहार के हज़ारों बेमिसाल प्रतिभाओं के सम्मान से सीधे जुड़ी है.

ज़ी बिहार झारखंड की टीम ने जब गोपाल प्रसाद से बात की तो उन्होंने अपनी बेबसी की कहानी कही. नौकरी के लिए उन्होंने कई जगह गुहार लगाई, लेकिन काम नहीं बना. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दफ्तर से चिट्ठी भी मिली, लेकिन काम नहीं हुआ. अब गोपाल प्रसाद को चाय की दुकान से जो वक्त मिलता है उसमें ये युवाओं को तैराकी का प्रशिक्षण देते हैं. इस काम के लिए वे कोई शुल्क नहीं लेते. गोपाल प्रसाद के मुताबिक, मकर संक्रांति के दिन गंगा में जो बड़ा नाव हादसा हुआ था उसमें कई ऐसे लोगों ने जान बचाई जिन्हें तैरने की ट्रेनिंग गोपाल प्रसाद ने दी थी.

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