आज है माता सीता का जन्म दिवस – जब सीतामढ़ी की धरती से प्रकट हुईं माता सीता..

आस्था

हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी या जानकी नवमी मनाई जाती है. मान्यता है कि मां सीता का इसी दिन जन्म हुआ था. मां सीता के जन्म और उत्पत्ति से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं. यह मान्यता है कि सीता का जन्म पुश्य नक्षत्र में हुआ था. उस दिन मंगलवार था. इसलिए इस बार सीता नवमी और भी ज्यादा शुभ है, क्योंकि यह मंगलवार के दिन ही आई है.

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या श्रीराम मंदिर बनाने को लेकर बराबर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहती है लेकिन उनको मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने में अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाली उनकी अनुगामिनी माता सीता की प्राकट्यस्थली ‘सीतामढ़ी’ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व नहीं मिल पाया है।

आइए, हम जानें वैशाख नवमी के दिन मां जानकी सीतामढ़ी की धरती पर कैसे प्रकट हुईं थीं। आज भी यहां के लोग इस धरती पर मां सीता के जन्मदिन पर सप्ताहभर का कार्यक्रम आयोजित करते हैं। यहां देश-विदेश से संतों का भी आगमन होता है। जिला प्रशासन की ओर से भी यहां सीतामढ़ी महोत्सव आयोजित होता है।

मुजफ्फरपुर-रक्सौल रेलखंड पर स्थित सीतामढ़ी का नाम सीता के यहां प्रकट होने के कारण ही पड़ा। इसको पहले सीतामही अर्थात सीता की धरती कहा जाता था। लेकिन, बाद में अपभ्रंश होकर यही सीतामढ़ी हो गया।

कैसे हुआ था जन्म

मां सीता को जानकी पुत्री के नाम से जाना गया. मिथिला के राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. इस बात से वह बहुत दुखी थे. तभी मिथिला में अकाल पड़ गया. राजा जनक इससे और भी ज्यादा परेशान हो गए और ऋषि मुनियों की सलाह से यज्ञ करने लगे. इस यज्ञ के साथ ही राजा जनक को खेत भी जोतना था. मुनियों ने कहा कि इसके बाद ही यज्ञ पूरा माना जाएगा.

जनक खेत जोतने के लिए हल चलाने लगे. तभी हल की नोक से धातु की कोई वस्तु टकराई. जनक ने उसे नजरअंदाज कर दिया और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे. काफी प्रयास करने के बावजूद जनक वहां से हल हटा नहीं पा रहे थे.

जनक ने उस जगह की खुदाई कराई. खुदाई करने के बाद वहां से एक कलश निकला. जनक ने जैसे ही कलश का ढक्कन हटाया, उन्हें उसके अंदर एक सुंदर सी नवजात बालिका नजर आई. राजा जनक हैरान हो गए और बच्ची को अपने गोद में ले लिया. तभी आसमान में काले बादल घिर गए और बारिश होने लगी. मिथिला का अकाल समाप्त हो गया.

मिथिला नरेश जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस नवजात कन्या को ही भगवान का वरदान मानकर संतान के रूप में स्वीकार कर लिया.

कैसे पड़ा सीता का नाम

हल की नोक को सीत कहते हैं. हल की नोक यानी सीत से टकराने के कारण ही राजा जनक को वह कलश प्राप्त हुआ था, जिसमें नवजात बच्ची थी. इसलिए राजा जनक ने उनका नाम सीता रख दिया. सीत से जन्म लेने वाली सीता.

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जनकपुर नेपाल के महल में हुआ लालन-पालन

इस तरह मां सीता प्रकट हुईं, इसके बाद उनका लालन पालन नेपाल के जनकपुर धाम स्थित राजा जनक के महल में हुआ। वहां जनकपुर में भी भव्य विशाल मंदिर है, जहां मां जनकी के जन्म के अवसर पर भारतवर्ष से बड़ी संख्या में साधु-महात्मा जाकर मां जानकी की पूजा अर्चना करते हैं।

जानकी स्थान और पुनौरा में भव्य मंदिर

यहां सीतामढ़ी में भी दो जगहों पर एक जानकीस्थान और दूसरा पुनौरा में मां जानकी और श्रीराम का भव्य मंदिर है। यहां के उर्विजा कुंड और सीता कुंड की पूजा भी होती है।

जन्म पर बधाई दे रहीं महिलाएं 

इन जगहों पर मां जानकी के जन्म को लेकर इनदिनों बधाई और मंगलगीत दिनभर महिला श्रद्धालु गाती हैं। इस अवसर पर भव्य झाकियां भी प्रदर्शित की गई हैं। जिसमें राजा जनक के हल चलाने के दौरान मां के प्रकट होने, मां की गोद में सीता के खेलने, बधाई गाती महिलाओं को दर्शाया गया है। इसको देखने के लिए भारतवर्ष के कोने-कोने से श्रद्धालु आए हैं।
भक्तों और संतों की टोली जनकपुर धाम नेपाल से लेकर सीतामढ़ी तक जुट चुकी है। सभी जगह मां जानकी का गुणगान हो रहा है।

सीता नवमी का महत्व

सीता जयंति या सीता नवमी का महत्व खासतौर से उन महिलाओं के लिए है, जो शादीशुदा हैं. मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजन करने वाली महिलाओं के पति की उम्र लंबी होती है. मां सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, जिनका जन्म त्रेता युग में मिथिला में हुआ था. इसलिए यह माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं का सुहाग अमर होता है और उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधरती है. साथ ही मां सीता, सेहत और खुशहाली का वरदान भी देती हैं और ऐसे लोगों को संतान सुख भी प्राप्त होता है.

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