शिक्षा विभाग में पुरानी व्यवस्था बहाल करेगी नीतीश सरकार, अगले सत्र से खाते में पैसे नहीं, सीधे मिलेंगी किताबें

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बिहार के सभी सरकारी प्राइमरी स्कूलों के छात्र-छात्राओं को अब नए सत्र से उनके खाते में पुस्तक क्रय की राशि नहीं भेजी जाएगी। इस व्यवस्था की जगह पांच-छह साल पुरानी व्यवस्था फिर से बहाल की जाएगी। 6 से 14 साल के बच्चों के अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा कानून (आरटीई) के तहत एक बार फिर से राज्य सरकार निशुल्क किताबें उपलब्ध कराएगी।

सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्वीकृति के बाद शिक्षा विभाग ने बच्चों तक पाठ्य-पुस्तक पहुंचाने की पुरानी व्यवस्था पर गंभीरता से काम आरंभ कर दिया है। अब जल्द ही प्रकाशक तय किये जाएंगे और उन्हें किताब छापकर बच्चों तक निशुल्क पहुंचाने की जिलावार जिम्मेदारी भी दी जाएगी। शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह ने कहा कि एक सप्ताह के अंदर प्रकाशक चयन का टेंडर जारी किया जाएगा।

शिक्षा विभाग नए सत्र 2023-24 से 72 हजार प्रारंभिक विद्यालयों के तकरीबन डेढ़ करोड़ बच्चों को मुफ्त किताब उपलब्ध कराएगा। बच्चों को किताबों का सेट बनाकर अप्रैल के पहले हफ्ते में वितरण सुनिश्चित कराने के लिए अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह के निर्देश पर संबंधित अधिकारी जुट गये हैं। बिहार राज्य पाठ्य पुस्तक निगम ने तैयारियां तेज कर दी हैं। किताबों को छापने की जिम्मेदारी निजी प्रकाशकों को मिलेंगी। ये प्रकाशक कौन-कौन होंगे तथा किताब वितरण को लेकर कब क्या होगा, इसका पूरा कैलेंडर अपर मुख्य सचिव की देखरेख में तैयार किया जा रहा है।]

देश के ज्यादातर राज्यों में शिक्षा के अधिकार के तहत प्राइमरी कक्षा के विद्यार्थियों को किताबें ही मुहैया कराई जाती हैं। बिहार में भी 5 साल पहले यही व्यवस्था लागू थी लेकिन प्रकाशक तय करने, किताबें छापने, उन्हें जिला, प्रखंड और पंचायत तक पहुंचाने तथा विद्यालय ले जाकर हर बच्चे को देने तक में किसी सत्र में अक्टूबर तो किसी सत्र में दिसम्बर में जाकर किताब वितरण संभव हो पाता था। बच्चे सत्र के छह-आठ महीने बिना किताबों के ही पढ़ने को मजबूर हो रहे थे। सत्र 2017-18 में किताब देने की जगह बच्चों के खाते में पैसा देने का बिहार सरकार ने निर्णय लिया था। पिछले पांच सत्र से पहली से पांचवीं के बच्चों को 250 रुपए जबकि कक्षा 6 से आठ के बच्चों को 400 रुपए पुस्तक क्रय के एवज में उनके खाते में दिया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक हर साल 400 करोड़ से लेकर 520 करोड़ रुपए विभाग की तरफ से बच्चों के खाते में भेजे गए लेकिन पैसा पाने के बावजूद महज 25 से 40 फीसदी बच्चे ही किताब खरीद रहे हैं। बच्चों के अभिभावक किताब क्रय के पैसे का उपयोग घर के खर्चों में कर ले रहे हैं। ऐसे में बिहार सरकार पुरानी व्यवस्था के तहत किताब उपलब्ध करवाने की कार्ययोजना तैयार कर रही है।

 

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