फिल्म ‘शोले’ और ‘दीवार’ छोड़ने का मुझे जिंदगी भर अफसोस रहेगा- शत्रुघ्न सिन्हा

कही-सुनी

पटना: पटना साहिब के भाजपा सांसद ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा कि 1992 में राजेश खन्ना के खिलाफ लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उन्होंने कसम खायी थी कि वो फिर कभी बीजेपी के दफ्तर नहीं जाएंगे। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर वे राजनीति में सक्रिय हुए। इसके अलावा शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने फिल्मी जीवन की गलतियों पर भी बेबाकी से राय रखी। उन्होंने कहा कि फिल्म ‘शोले’ और ‘दीवार’ छोड़ने का उन्हें जिंदगी भर अफसोस रहेगा।

शत्रुघ्न सिन्हा ने एक चैनल के साहित्यिक कार्यक्रम में भी मोदी सरकार पर तंज कसने का मौका नहीं छोड़ा। अपने ‘ खामोश’ डायलॉग पर उन्होंने कहा कि अब लगता है कि हम सब खामोश हो गए हैं। देश में जो माहौल चल रहा है उसमें सब कोई खामोश हैं। उन्होंने कहा, ‘मैंने अपनी किताब  ‘एनीथिंग बट ख़ामोश’  सबसे पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसलिए नहीं दे सका, क्योंकि तब तक ये आई नहीं थी’। अपने ‘ खामोश’ डायलॉग पर सिन्हा ने कहा, ‘अब लगता है कि हम सब खामोश हो गए हैं। देश में जो माहौल चल रहा है, उसमें सब कोई खामोश है’। सिन्हा ने एक कविता के जरिये मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया। “अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं, पर कहता नहीं बोलना भी है मना, सच बोलना तो दरकिनार”

इस कार्यक्रम में शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने फिल्मी सफर का भी जिक्र किया। उन्होने कहा कि मैंने विलेन के रोल में कुछ अलग किया। मैं पहला विेलेन था, जिस के परदे पर आते ही तालियां बजती थीं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। विदेशों के अखबारों में भी ये आया कि पहली बार हिन्दुस्तान में एक ऐसा खलनायक उभरकर आया, जिस पर तालियां बजती हैं। अच्छे अच्छे विलेन आए, लेकिन कभी किसी का तालियों से स्वागत नहीं हुआ। इन तालियों की वजह से मुझे कई फिल्में मिलीं। इसके बाद डायरेक्टर मुझे विेलेन की जगह हीरो के तौर पर लेने लगे। एक फिल्म आई थी ‘बाबुल की गलियां’ जिसमें मैं विलेन था, संजय खान हीरो और हेमा मालिनी हीरोइन थीं। इसके बाद जो फिल्म आई ‘दो ठग’ उसमें हीरो मैं था और हीरोइन हेमा मालिनी थीं। मनमोहन देसाई को कई फिल्मों में अपना एंड चेंज करना पड़ा। ‘भाई हो तो ऐसा’ और ‘रामपुर का लक्ष्मण’ ऐसी ही फिल्में हैं।

बिहारी बाबू ने कहा कि फिल्म ‘शोले’ और ‘दीवार’ ठुकराने का उन्हें आज भी अफसोस है लेकिन खुशी भी है कि इन फिल्मों ने उनके दोस्त अमिताभ बच्चन को स्टार बना दिया। शत्रुघ्न के मुताबिक यह फिल्में न करना उनकी गलती थी और इस गलती को महसूस करने के लिए उन्होंने आज तक ये दोनों फिल्मों नहीं देखी। शत्रुघ्न सिन्हा के मुताबिक मैंने रोल को कभी विलेन के तौर पर नहीं, रोल की तरह ही देखा। मैं विलेन में सुधरने का स्कोप भी देखा करता था। मैं नौजवानों को एक मंत्र देता हूं कि अपने आप को सबसे बेहतर साबित करके दिखाओ, यदि ऐसा नहीं कर सकते तो सबसे अलग साबित करके दिखाओ।

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