शराबबंदी के बाद गांजा, चरस, ड्रग्स ले रहे 10 से 25 साल के बच्चे: नीतीश सरकार पर बरसा पटना हाईकोर्ट

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पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि बिहार में शराबबंदी से पहले ड्रग्स के केस कभी-कभार आते थे लेकिन शराब बैन होने के बाद 10 से 25 साल के बच्चे ड्रग्स ले रहे हैं और गांजा, चरस, भांग की खपत काफी बढ़ गई है। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार पूरे बिहार में ड्रग्स की तस्करी रोकने में नाकाम रही है जिसकी वजह से ये हाल हुआ है।

शराबबंदी के एक केस में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के जज जस्टिस पुर्णेंदु सिंह ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के जान-बूझकर हाथ पर हाथ धरे रहने के कारण पूरे राज्य में शराब की तस्करी से लेकर शराब बनाने तक का काम बढ़ रहा है। जस्टिस सिंह ने मामले को चीफ जस्टिस को रेफर करते हुए इस पर संज्ञान लेने और एक जनहित याचिका का केस शुरू करने की सिफारिश की है। बिहार में 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। बिहार में इस साल ही जहरीली या नकली शराब पीने से 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करने में राज्य सरकार की विफलता के कारण लोगों की जान को खतरे में डाल दिया गया है। कोर्ट ने शराबबंदी के केस की बड़ी संख्या पर कहा कि पहले से ही मुकदमों के बोझ से दबी न्यायपालिका के ऊबपर ये अतिरिक्त बोझ है।

कोर्ट ने कहा- “डेटा कहता है कि 2015 से पहले ड्रग्स के केस ना के बराबर थे। लेकिन 2015 के बाद ये बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इसमें ज्यादा चिंता की बात ये है कि नशे के ज्यादातर आदी 10 साल से 25 साल की उम्र के हैं। आंकड़े बताते हैं कि शराबबंदी के बाद गांजा, चरस, भांग की खपत बढ़ गई है। सरकार पूरे बिहार में ड्रग्स की तस्करी रोकने में नाकाम रही है।”

जस्टिस सिंह ने कहा कि लोगों की सेहत ठीक रखने के लिए ही बिहार में शराबबंदी कानून लागू किया गया था लेकिन कई कारणों से ये इतिहास की नजर में गलत तरफ चली गई है। जस्टिस सिंह ने कहा कि पड़ोसी राज्यों और नेपाल से शराब की तस्करी के कारण बिहार में शराब बैन फेल हो रहा है लेकिन सरकार के अधिकारी कुछ कर नहीं पा रहे हैं, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। कोर्ट ने कहा कि इससे बिहार में अवैध शराब की एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन गई है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि बिहार का शराबबंदी कानून अदूरदर्शी फैसला है। रमना ने कहा था कि ठोस विचार के कानून बनाने से देश की अदालतों पर बोझ बढ़ता है। मार्च, 2022 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने बिहार सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक अदालत हैं, जमानती अदालत नहीं कि हाईकोर्ट के 60 परसेंट जज बेल की अपील सुनते रहें।

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