बिहारी जुनून- गरीबी के कारण डॉक्टर न बन सके पर आज 25,000 करोड़ की दवा कंपनी के हैं मालिक

बिहारी जुनून

कुछ करने का जुनून हो तो अपनी मंजिल तक पहुँचने से किसी को कोई भी रोक नहीं सकता। हम आपको एक ऐसे ही इंसान की कहानी बताने जा रहे जिसने अभावों के वाबजूद सफलता की बुलंदियों को छुआ।

ये कहानी है बिहार के जहांनाबाद जिले के छोटे से गांव ओकरी के एक किसान परिवार में जन्मे संप्रदा सिंह की जो बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहते थे। देश के सबसे दिग्गज उद्योगपति में शामिल संप्रदा सिंह आज एल्केम लेबोरेटरीज नाम की एक बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी की स्थापना करने के बाद देश के सबसे प्रभावशाली फार्मास्युटिकल उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं।

अपनी अभूतपूर्व सफलता के लिए संप्रदा सिंह को फार्मा उद्योग के आॅस्कर के समकक्ष एक्सप्रेस फार्मा एक्सीलेंस अवाॅर्ड से भी सम्मानित किया जा चूका है।

कभी संप्रदा सिंह के डॉक्टर बनने के सपने को साकार करने के लिए इनके पिता ने घर की दयनीय आर्थिक स्थिति होने पर भी मेडिकल एंट्रैन्स एग्जाम की तैयारी करने के लिए पटना भेजा। काफी मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं मिल सकी।

घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए संप्रदा ने रोजगार की तलाश शुरू कर दी। फिर वर्ष 1953 में पटना में दवा की एक छोटी सी दुकान खोल दिया।

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सिर्फ कुछ हज़ार रूपये से शुरू किये अपने बिज़नस को अपनी कड़ी मेहनत, लगन और मिलनसारिता से कुछ ही सालों में काफी बढ़ लिया। 1960 में इन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करने के लक्ष्य से ‘मगध फार्मा’ नाम से एक फार्मास्युटिकल्स डिस्ट्रिब्यूशन फर्म की शुरुआत कर जल्द ही कई मल्टीनेशनल दवा कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूटर बन गए।

samprda-singhऊँची सोच रखने वाले संप्रदा सिंह ने एक दिन सोचा कि जब शून्य से शुरुआत कर एक सफल डिस्ट्रिब्यूशन फर्म बनाई जा सकती है तो क्यों न अपनी ही एक फार्मा ब्रांड बाजार में उतारी जाये। फिर इसी सोच और संकल्प के साथ वो मुंबई पहुंचे।

साल 1973 में ‘एल्केम लेबोरेटरीज’ नाम से संप्रदा सिंह ने खुद की दवा बनाने वाली कंपनी खोली। प्रारम्भ में पूंजी की कमी से पांच साल तक उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा।

उनकी ज़िन्दगी का टर्निंग पाइंट आया 1989 में जब एल्केम लैब एक एंटी बायोटिक कंफोटेक्सिम का जेनेरिक वर्जन टैक्सिम बनाने में सफल हुआ।

इस दवा की इन्वेंटर कंपनी फ्रांस की बहुराष्ट्रीय कंपनी मेरिओन रूसेल, जिसे अब सेनोफी एवेंटिस के नाम से जानते हैं, ने एल्केम को बहुत छोटा प्रतिस्पर्धी मानकर गंभीरता से नहीं लिया था। अपनी किफायती मूल्य के कारण टैक्सिम ने मार्केट में वर्चस्व कायम कर लिया जिससे फार्मा इंडस्ट्री में एल्केम लेबोरेटरीज को एक नई पहचान मिली।
अपनी जन्मभूमि बिहार में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने के लिए संप्रदा सिंह ने 100 करोड़ रुपए का निवेश कर एक एग्रो फूड यूनिट स्थापित करने की योजना पर काम कर रहे हैं।

30 देशों में अपने कारोबार का विस्तार करते हुए विश्व के फार्मा सेक्टर में पहचान बनाने वाली एल्केम लेबोरेटरीज आज फार्मास्युटिकल्स और न्यूट्रास्युटिकल्स बनाती है। फोर्ब्स इंडिया के 100 टॉप भारतीय धनकुबेरों की सूची में शामिल संप्रदा सिंह ५२वें क्रम पर हैं।
Related imageसाथ ही 2.8 बिलियन डाॅलर अर्थात करीब ₹19,000 करोड़ ki निजी संपत्ति के मालिक संप्रदा सिंह यह दर्जा हासिल करने वाले पहले बिहारी उद्यमी हैं। आज करीब 92 वर्ष की उम्र में भी संप्रदा सिंह थके नहीं हैं और बिज़नेस की दुनिया में वैश्विक पटल पर भारत का नाम ऊँचा करने में लगे हैं।

1 thought on “बिहारी जुनून- गरीबी के कारण डॉक्टर न बन सके पर आज 25,000 करोड़ की दवा कंपनी के हैं मालिक

  1. Excellent !!!!
    Mr. Sampada Singh is a role model for all of us . Each Bihari has potential provided Learning from Mr. Singh’s life is implemented – PIE ( Passion Innovation and Execution ) .

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