इंग्लैंड से पढाई कर लौटे बिहार, अब कर रहे हैं गांव का विकास

बिहारी जुनून

हर इंसान गाँव की बदहाली और गरीबी से निकलना चाहता है। कुछ को मौका मिलता है बहार निकलने का चाहे पढ़ने के लिए या किसी को रोज़गार के लिए। फिर लोग अपनी ज़िन्दगी को और बदलने में लग जाते हैं।

पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी ज़नदगी के साथ समाज के लिए भी सोचते हैं और दूसरों की ज़िन्दगी भी सुधारने की कोशिश करते हैं।

बिहार के आशुतोष कुमार भी उन्ही लोगों में से हैं जिनके लिए सामाजिक हित ज्यादा महत्वपूर्ण है तभी तो शहर की सभी सुख-सुविधाओं को छोड़ अपने गांव की तस्वीर बदलने में लगें है।

बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में पले बढ़े आशुतोष कुमार ने पटना से दसवीं और बोकारो बारहवीं की पढ़ाई करने के बाद इंग्लैंड की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी से कम्युनिकेशन सिस्टम में इंजीनियरिंग करने चले गए।

अपनी मातृभूमि की उन्नति के लिए काम करने का लक्ष्य लिए वो स्वदेश लौटकर गांधीनगर स्थित नरेंद्र मोदी जी के प्रचार प्रबंधन टीम(सिटीजन्स फॉर अकॉउंटबले गवर्नेंस) में काम करने लगे।

वहां काम करने और बहुत कुछ सीखने के बाद आशुतोष अपने जिले के गाँव को मॉडल गाँव बनाने वापस आ गए। गाँव में पंजाब नेशनल बैंक का ग्राहक सेवा केंद्र खुलवाने के साथ हर घर के सदस्यों का बैंक अकाउंट खुलवाया। अब गाँव को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का अभियान शुरू किया है।

 

अपने खुद के खर्चे से आशुतोष ने पांच गरीब बच्चों के पढ़ाई की जिम्मेदारी ली है और इनका कहना है कि बच्चे जिस भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं वो उस में उनकी सहायता करेंगे।

इसी क्रम में अभी सन्नी नाम के एक गरीब दंपत्ति के बेटे को न सिर्फ दिल्ली स्थित कोचिंग संस्थान में एडमिशन करवाया, बल्कि कोचिंग के संस्थापक के सहयोग से सन्नी की मुफ्त शिक्षा ग्रहण का प्रबंध किया। वहां रहने का खर्च आशुतोष ने अपने जिम्मे लिया।

बिहार के रूरल डेवलपमेंट के लक्ष्य के साथ आशुतोष ने आम और लीची को विदेशी बाजार में उतारने के लिए विलेज शॉप के नाम से एक नयी पहल की की थी।

विलेज शॉप में बदलाव कर अब विलेज मार्ट नाम से एक ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया जा रहा है। इससे गाँव में काम कर रही महिलाओं और युवाओं को जोड़कर इस पोर्टल के माध्यम से गांव का सामान दुनिया के बाजार में बेच जा सकेगा।

 

रूरल सोर्सिंग के मकसद से अपने एनजीओ सजल फाउण्डेशन के माध्यम की तरफ से आशुतोष औरंगाबाद में गरीब बच्चों को कंप्यूटर ट्रेनिंग दे रहे हैं।

उनका मानना है की रूरल सोर्सिंग के माध्यम से शहरों में हो रहे आईटी से जुडे हुए काम, बीपीओ इत्यादि को गाँव गांव लाकर यहाँ रोजगार बढ़ाया जाये। इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू कश्मीर में कभी आतंकवादियों का गढ़ माने जाने वाले डोडा जिले में भारत सरकार की सहायता से बीपीओ खोला जिससे लगभग 150 बेरोजगार कश्मीरी युवकों को नौकरी मिली।

सजल फाउण्डेशन अभी उत्तर पूर्व राज्यों में चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के साथ मिल कर बच्चों को मूवी बनाने, फोटोग्राफी की ट्रेनिंग देने के साथ बच्चों के लिए मूवी स्क्रीनिंग करवा रहा।

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इतना ही नहीं, भारत सरकार ने इन्हें 2015 में कामनवेल्थ युथ कौंसिल के चुनाव के लिए भारत के तरफ से नामित किया था।

गाँव के विकास में सहयोग देने के लिए इंटरनेशनल कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ NGOs एवं संयुक्त राष्ट्र की तरफ से संयुक्त रूप कर्मवीर पुरस्कार और ‘REX कर्मवीर ग्लोबल फ़ेलोशिप’ से सम्मानित भी किया जा चूका है। कर्मवीर पुरस्कार समाज में उत्कृष्ट काम करने वालो को प्रत्येक वर्ष दिया जाता है।

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