रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं त्योहार के फल और पकवान, जानें इनके गुण और फायदे

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नहाय-खाय से लोक आस्था का महापर्व छठ की शुरुआत  आज शुक्रवार से हो रही है। प्रारंभ से लेकर सुबह के अर्घ्य यानी समापन तक इस व्रत में प्रयुक्त होने वाली सामग्री का आयुर्वेद और स्वास्थ्य कारणों से भी बड़ा महत्व है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. सुशील कुमार झा, डॉ. मधुरेंदु पांडेय और डॉ. धनंजय शर्मा ने बताया कि पहले दिन कद्दू-भात से लेकर छठ के ठेकुआ तक में कई ऐसे तत्व मिलते हें जो स्वास्थ्यवर्द्धक साबित हो सकते हैं। बताया कि नहाय-खाय के दिन व्रती महिला-पुरुष कद्दू (लौकी) भात खाते हैं।

कद्दू कद्दू पूरी तरह से सात्विक है। इसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने की क्षमता होती है। साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अगर देखें तो कद्दू आसानी से पच भी जाता है आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखे तो यह गुरु, रुचिकर, हृदय के लिए हितकारी तथा धातुओं को पुष्ट करते है।

चना दाल चने में प्रोटीन 17.1 प्रतिशत, कार्बेाहाइड्रेट 61.2 प्रतिशत और 5.3 प्रतिशत खनिज, विटामिन ए, बी 1 पाया जाता है।

गागर नींबू में विटामिन सी अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त विटामिन बी 1, कॅरोटीन तथा साइट्रिक अम्ल आदि द्रव्य पाये जाते हैं। रस में न्यूमोनिया रोधी तत्व एवं तृणाणुनाशक तत्व होते हैं। छिलके में सुगंधी तेल एवं तिक्त द्रव्य होता है। गुण और प्रयोग यह अम्ल, वात, कफ नाशक, दीपन, पाचन एवं तृष्णा निवारक है।

● नारियल-  ताजा 100 ग्राम नारियल में आर्द्रता 36.3 प्रतिशत होती है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, तेल, फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन सी और आयरन-कॉपर पाए जाते हैं। नारियल मधुर, वृंहण वस्य शीत एवं वस्तिशोधक (मूत्र ब्लैडर की शुद्धि करता) है।

● सिंघाड़ा-  स्वादिष्ट तथा कषायरसयुक्त, शीतल, गुरु, वृश्य (वीर्यवर्धक), ग्राही, शुक्र, वास तथा कफजनक व पित्त, रक्तविकार और दाह को दूर करने वाला होता है। इसमें मैगनीज तथा स्टार्च होता है। गुण व प्रयोग यह शीत, पौष्टिक, वृष्य, शोणितास्थापन ग्राही, दीपन, इसकी पेया अतिसार एवं प्रदर में दी जाती है। पित्त प्रकृति वालों को तथा गर्मिणी को इससे लाभ होता है।

● केला-  पके केले का फल बल बढ़ाने वाला, रक्तपित्त शामक, संग्राहक तथा जीवनीय है। इससे शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ती है, आन्त्र की क्रिया सुधरती है तथा रक्त की अम्लता कम होती है।

● सेब-  इसका फल मधुर, शीत, ग्राही, शुक्रल, वृंहण, कफकर, एवं वातपित्तहर होते हैं। यह हृदय, मस्तिष्क, यकृत एवं आमाशय को शक्ति देनेवाला है। रक्तातिसार तथा आमातिसार में सेब का मूरना देते हैं। विबंध में भी इसका उपयोग होता है।

● ईख-  तृष्णा, दाह, मूर्च्छा, पित्त तथा रक्तविकार को दूर वाला, गुरु, मधुर रसयुक्त, बलकारक, स्निग्ध, वातनाशक, सारक, वीर्यवर्धक, मोह को दूर करने वाले, शीतल, वृहण (रस रक्तादिवर्धक) तथा विषनाशक होता है।

● अदरक-  अदरक से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। यह दर्द में राहत दिलाने में कारगार है। इससे माहवारी के दौरान होने वाली परेशानी में भी राहत मिलती है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और सांस संबंधी बीमारियों में असरकारक होता है।

● कच्ची हल्दी-  कच्ची हल्दी के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ती है। सर्दी-जुकाम की समस्या से भी छुटकारा मिलता है। कच्ची हल्दी बालों के विकास में भी फायदेमंद होती है। हल्दी में एंटी बैक्टीरियल, एंटीफंगल, एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं।

अरवा चावल बलवर्धक है। कार्बोहाइड्रेट शरीर की क्षमता बढ़ाने में मददगार। पाचन क्रिया बेहतर बनाता है। अरवा चावल पेट के लिए भी ठीक होता है।

● ठेकुआ-  गेहूं रक्त को साफ करता है, वजन घटाता है, पाचन को मजबूत करता है। हृदय रोग, हाई बीपी, उच्च रक्तचाप और थायराइड में गेहूं फायदेमंद होता है। गुड़ के साथ मिलकर यह शक्तिवर्धन का काम करता है।

● सूथनी-  भूख को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। जिन लोगों को खाना खाने के बाद भी भूख लगती है, उन्हें डाइट में सुथनी को शामिल करने की सलाह दी जाती है। सुथनी विटामिन बी का अच्छा स्रोत है। पेट के अल्सर में सुथनी का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है। पेप्टिक अल्सर के उपचार में हर्बल दवाइयों के उपयोग पर हुए एक शोध में बताया गया है कि सुथनी में एंटी बैक्टीरियल और एंटी माइक्रोबियल गुण मौजूद होते हैं, जो पेट के अल्सर में फायदेमंद साबित होता है।

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