अखबारों में, अपने आस पड़ोस में, कभी किसी आम की इंसान कभी किसी सेलेब्रिटी की ..ना जाने हम कितनी ही कहानियों से रूबरू होते हैं! जिन कहानियों में किसी के आत्महत्या की कड़वी सच्चाई होती है। वो लोग जो अपनी जिंदगी के परेशानियों से तंग आकर या यूं कहें तो भागकर मौत को गले लगा लेते हैं। लेकिन इनमें से ही कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनकी हिम्मत उनकी जिंदगी की परेशानियां तय नहीं करती!

वो लोग जो दुखों का अंबार देखकर भी डगमगाते नहीं! वो लोग जो अपने हौसले बुलंद रखते हैं और दुनिया के लिए मिसाल कायम करते हैं! आज हम आपको उन्हीं लोगों में से एक बिहार की बेटी की कहानी सुनाते हैं! जिन्होंने कई ब्लॉग्स लिखी हैं और एक किताब जो सिर्फ तीन से चार दिन में लिखी है और तमाम समाज के लिए मिसाल कायम की है।

बिहार की बेटी रेणु एक सफल लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर और साथ ही एक बिजनेस मैनेजमेंट प्रोफेशनल भी हैं! मगर इनकी जिंदगी की ये सफलता इन्हें ऐसे ही हासिल नहीं हुई। रेणु ने अपनी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव देखे हैं!

आज से बीस साल पहले वो बिहार को छोड़कर पढ़ने के लिए बाहर निकली थी। ऐसा करना उनकी चाहत से ज्यादा मजबूरी थी। घर में उनके दो भाई दिव्यांग थे। उनके भविष्य को संवारने के लिए रेणु बिहार छोड़कर बाहर निकली। ताकि वो खुद को आत्मनिर्भर बना सक! अपने परिवार के लिए कुछ कर जाने की ललक ने उन्हें और भी मजबूत और आजाद बनने में मदद की! उनके परिवार को भी जिंदगी के कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा!

2016 में उनके परिवार ने अपना एक बेटा खोया और रेणु ने अपना भाई! मगर ऐसे वक़्त में जहां जिंदगी चारों तरफ से हालात और मुश्किल बना रही हो, जहां दुख के अंधेरे के सिवा कोई रौशनी ना दिख रही हो.. जहां लोग खुदकुशी को गले लगा लेते हैं। वहां रेणु ने हार नहीं मानी.. वो लहरों के समक्ष चट्टान सी अडिग रही। अपनी सभी परेशानियों से लड़कर रेणु ने खुद को और मजबूत बनाया! उन्हें ‘टेड टाक्स’ के माध्यम से खुद को और भी मजबूत बनाया और कई नॉमिनाशन्स भी आये है! आज वो एक मोटिवेशनल स्पीकर हैं और साथ ही एक सफल बिजनेस मैनेजमेंट प्रोफेशनल भी!

अपनी जिंदगी के कहानी को समेटते हुए, उन्होंने एक किताब लिखी है। जो किताब अप्रैल के मध्य में रिलीज होगी। रेणु कहती हैं कि उनके अंदर इतना दर्द दफन था कि मात्र चार दिन लगे उन्हें उनकी किताब पूरी करने में! उनका कहना यही है कि जिस तरह से वो खुद जिंदगी के प्रहार से डरी नहीं, गिरी नहीं .. वैसे ही वो समाज के उन तमाम लोगों को बनाना चाहती है जो कहीं ना कहीं अपनी छोटी बड़ी तकलीफों से हारे हुए हैं। वो कहती है कि दर्द का दर्द रहना आपकी कमजोरी है और दर्द का दवा बन जाना आपकी हिम्मत !

 

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