Ravish Kumar

बेतुकी विमर्शों के दौर में जब पत्रकारिता दम तोड़ रही है, ऐसे में उसी दुनिया का एक शख्श अकेले ही पूरी पत्रकारिता की परिभाषा बदलते हुए नज़र आ रहा है। ये कोई और नहीं हमारे बिहार की गलियों से निकलकर भारत की टीवी पत्रकारिता और ब्लॉगिंग की दुनिया में सबसे नामी चेहरा बनकर उभरे रवीश कुमार हैं। आज की पत्रकारिता में विश्वसनीयता मतलब “रवीश” हो चुका है। रवीश की रिपोर्ट और प्राइमटाइम ने न जाने कितने युवाओं को रवीश बनने का सपना दिखाया है।

रवीश बिहार के ही मोतिहारी के रहने वाले हैं। इनका गाँव जितवारपुर है। रवीश ने अपनी स्कूली पढ़ाई पटना के लोयला हाइस्कूल से की है। इसके बाद इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक करके प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। कहा जाता है कि रवीश ने सिविल सेवा की परीक्षा में नाकामी के बाद अपना रास्ता बदल दिया। इन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान से हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा की और स्टार न्यूज़ से लेकर एनडीटीवी इंडिया में हर तरह के काम किये।

रवीश की व्यक्तिगत जीवन भी काफ़ी रोमांचक रही है और यह उनके किताब “इश्क में शहर होना” पढ़कर पता चल जाता है। रवीश ने लोगों को “लप्रेक” यानी कि लघु प्रेम कथा लिखने को प्रेरित किया।रवीश जब अपनी एमफिल की पढ़ाई कर रहे थे तो उस दौरान उनकी मुलाकात नयना दासगुप्ता से हुई। दोनों एक दूसरे को काफ़ी पसंद करते थे। बाद में इन्होंने शादी भी की। नयना फ़िलहाल लेडी श्री राम कॉलेज में इतिहास की प्रोफ़ेसर हैं।

रवीश ने अपने पत्रकारिता के अनुभव पर एक किताब, “देखते रहिये” लिखी है। रवीश आज के समय में कुछेक चुनिंदा पत्रकारों में से एक हैं जो जनहित के मुद्दों को अपने शो में ज़्यादा वरीयता देते नज़र आते हैं। इसके लिये उन्हें जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक भी कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। रवीश के प्राइमटाइम इंट्रो में जो पहला चार-पाँच मिनट होता है वो इतना प्रभावी होता है कि उस बांधे हुए समा से दर्शक टीवी से अगले घंटे तक चिपकने को मजबूर हो जाते हैं। रवीश देखते ही देखते पत्रकार से जनपत्रकार हो गए। रवीश के एक वरिष्ठ सहयोगी अनिंद्दो चक्रवर्ती ने कहा भी था कि हमारे संस्थान में या पूरे मीडिया में अपने प्रतिभा का जितना बेहतर विकास रवीश ने किया है शायद ही किसी ने किया हो। किसी कार्यक्रम में रवीश से जब यह पूछा गया था कि उनकी सफ़लताओं के पीछे किसका हाथ है, तो उन्होंने अपने दोनों हाथों को दिखाते हुए कहा था कि मेरी सफ़लताओं के पीछे मेरे ये दो हाथ हैं।

रवीश को अपनी पत्रकारिता के लिये कई बड़े सम्मान भी मिले हैं। रवीश को 2013 में रामनाथ गोयनका पुरस्कार, 2014 में सर्वश्रेष्ठ हिंदी एंकर का पुरस्कार और इसी साल अपने ही राज्य में लोकरत्न सम्मान भी मिला जो महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के परिवार की तरफ़ से दिया जाता है। रवीश द्वारा बिहार के विश्वविद्यालयों पर चलाई गई सीरीज़ और “ये जो मेरा बिहार है” वो काफ़ी लोकप्रियता बटोरने में कामयाब रही थी।

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