रामायण काल का है यह शिव मंदिर, सावन में आते हैं लाखों श्रद्धालु

आस्था

सिंहेश्वर महादेव का इतिहास रामायण काल से बताया जाता है। लोग कहते हैं कि भगवान राम के बहनोई ऋषी श्रृंगी ने सिंहेश्वर महादेव की स्थापना की थी।सौम्य प्रकृति के गोद में परवाने तथा बैवाह नदी के संगम पर बसा सिंहेश्वंर शिवमंदिर और शिवरात्रि मेला के लिए प्रसिद्ध है। बिहार के उत्तरी क्षेत्र में कोसी प्रमण्डल के मधेपुरा जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर उत्तर में सिंहेश्वर स्थान एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यहां श्री सिंहेश्वर नाथ महादेव प्रतिष्ठित हैं। देश विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ बाबा सिंहेश्वर की पूजा अर्चना हेतु यहां जूटती है। पूर्व मध्य रेल का दौरम मधेपुरा स्टेशन से दिन भर सैकड़ों छोटी बड़ी वाहन नियमित चलती है। नेपाल से वीरपुर आने के बाद राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या.106 और पूर्णिया के रास्ते राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या.107 से चलकर सिंहेश्वर पहुंचा जा सकता है।



 

सिंहेश्वरनाथ का मंदिर कभी चंचला कोसी नदी के तट पर अवस्थित था किन्तु कोसी की मुख्यधारा के करवट लेने से इसकी उफनती धारा मंदिर से दूर चली गयी। लेकिन चंचला कोसी अपने नाम पर निकट में एक शाखा छोड़ गयी है जो वर्तमान में मृतप्राय है। कोसी की भीषण विभीषिका के चलते कभी यह मंदिर बालुका राशि में विलीन थी बाद में बालू की चमकीली रेतों की गिरफ्त से मंदिर को पूर्ण रुपेण मुक्त किया गया। सत्य ही शिव है तथा वे जगत के परोपकारी व सृष्टि के सुन्दरतम रूप है। जबकि अनंत ब्रह्माण्ड का अक्स ही लिंग है। शिवपुराण के ईषान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में महादेव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए।




ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है और जीवन रूपी चन्द्रमा का शिव रूपी सूर्य के साथ मिलन होता है। स्कंद पुराण के अनुसार आकाश स्वयं लिंग है व धरती उसकी पीठ या आधार है। किंदवंती है कि विभांडक के तपस्वी पुत्र ऋषि श्रृंग का सिंहेश्वर आश्रम था। महाभारत के वनपर्व के 110वें 111वें तथा 113वें अध्यायों में कौशिकी प्रसंग का रोचक वर्णन है। इसमें कहा गया है कि कोसी के तट पर कश्यवप ऋृषि के वंशज विभांडक ऋृषि का आश्रम था। उसी विभांडक का पुत्र ऋषि श्रृंग था जो बड़ा भारी तपस्वी और संयतेंद्रिय था। इसी काल में चम्पा आधुनिक भागलपुरद्ध का राजा रोमपाद हुआ करता था जिसे कोई पुत्र नहीं था पर शान्ता नाम की एक पुत्री थी। ऋषि श्रृंग की प्रशंसा सुनकर रोमपाद ने अपनी कन्या के लिए उसी को वर रुप में चुना और ऋषि पुत्र को किसी प्रकार लुभाकर लाने के लिए वेश्याओं का एक दल कौशिकी तट पर विभांडक आश्रम में भेजा।




वेश्यायें श्रृंग को रिझा कर नाव के द्वारा अंगदेश की राजधानी चम्पा ले आयी। बाद में शान्ता का विवाह ऋषि श्रृंग के साथ सम्पन्न हो गया। महाभारत के अनुसार जब ऋृष्य श्रृंग को पुत्र प्राप्त हो गया तब वे फिर अपने पिता के आश्रम में लौट गये। लोक धारणा है कि सिंहेश्वेर स्थान के शिव मंदिर को किसी काल में स्वयं विष्णु ने बनाया था।बारहपुराण में वर्णित सिंहेश्वर को हीनसिंहेश्वहर माना जाता रहा है। वाराह पुराण के अध्याय 206 में चर्चा है कि आदि देव महादेव एक बार हिरण का हृदय वेश धारण कर छिप गये। आदि देव की अनुपस्थिति में असुरों ने काफी उधम मचाया। त्रस्त ब्रह्मा विष्णु तथा इन्द्र देव उन्हें खोजने निकले। उनलोगों ने आदि देव को छद्मवेष में पहचान लिया और उनसे वापस चलने की विनती की। लेकिन हिरण रुपी छद्मवेशी महादेव ने देवताओं के साथ चलने में अपनी असमर्थता ब्यक्त की । तब तीनों देवताओं ने मिलकर हिरण रुपी महादेव को बलात् ले चलना चाहा और हिरण के सिंग को पकड़ कर खिंचने लगे। लिहाजा हिरण के अंग तीन भागों में विभक्त हो गए। श्रंृग अर्थात सिंग वाला भाग जिस स्थान पर रहा वही श्रृंगेश्वर अर्थात सिंहेश्वनर कहलाया।
त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्म के निमित ऋृष्य श्रृंग के द्वारा सम्पादित पुत्रेष्ठि यज्ञ यहीं हुआ था। सिंहेश्वर स्थान का सतोखर ग्राम सप्त पुष्कर सात पोखरद्ध यज्ञ का सप्त कुण्ड था। महर्षि श्रृंग ने अराध्य श्रृंगीश्वखर थे। प्रयत्न लाधव से श्रृंगीश्व र सिंहेश्वर स्थान बन गया। एक धारणा प्रचलित है कि शिव पुराण के रुद्र संहिता खण्ड में वर्णित महर्षि दधिचि और राजा ध्रुत के बीच अंतिम संघर्ष यहीं हुआ था। इसमें महर्षि दधिचि विजयी हुए थे। ऐसा भी कहा जाता है कि पांडवों ने विराटनगर नेपालद्ध के भीम बांध क्षेत्र में शरण लेने के पश्चात सिंहेश्ववर में शिव की पूजा की थी।




मध्ययुग के महान विद्वान पण्डित मंडन मिश्र सिंहेश्वर में भी रहते थे तथा शंकराचार्य से उनका शास्त्रार्थ यहीं हुआ था। इस शास्त्रार्थ में पराजित होने के बाद वे वौद्ध से सनातन बन गये थे। प्रतीक के रुप में अब भी पूर्वाभिमुख मन्दिर की उत्तरी बाहरी दीवार पर भगवान बुद्ध अवलोकितेश्वतर की प्रतिमा जप करते दीख पड़ते हैं। लेकिन श्रद्धालुओं के द्वारा उक्त प्रतिमा के अविरल स्पर्श से उसका स्वरुप बिगर गया है और स्थानीय कारीगरों ने भी उसके स्वरुप को बिगार दिया है। नवाब होशियार जंग बहादुर की के अनुसार सिंहेश्वर नाथ महादेव की सेवा अर्चना हेतु महाराजाधिराज दरभंगा श्री माधो सिंह ने मौजा गौरीपुर जिसे सिंहेश्वर भी कहते हैं को दान में दिया था। ऐसा कहा जाता है कि दरभंगा जिला के सिंघवारा गांव के श्री अनन्त ठाकुर को कोसी स्नान के पश्चांत रात्रि में स्वप्न हुआ जिसमें शिव ने साक्षात प्रकट होकर कहा कि तुम अपने गांव वापस जाने के बजाय मेरी पूजा करो। स्वप्न में उन्हें जिस शिव लिंग का दर्शन हुआ वह सिंहेश्वर स्थान की ही है। ऐसा अनुमान है कि अनन्त ठाकुर के वंशज ही ठाकुरोपाधि युक्त सैकड़ों पण्डे अभी भी सिंहेश्वर में हैं।
मिथिला महात्म्य में मिथिला क्षेत्र की परिक्रमा सिंहेश्वर स्थान से ही आरम्भ करने को कहा गया है। इससे इतना आभास मिलता है कि मिथिला की पूर्वी सीमा किसी काल में सिंहेश्वर स्थान तक ही थी। सीमा निर्धारण में मंदराचल तथा मुंजवान शिखर हिमालय के मध्यम से श्रृंगेश्वनर सिंहेश्वर को बताया गया है। इतिहासकार राधा कृष्ण चैाधरी के अनुसार सिंहेश्वर स्थान पर कभी कुषाण वंश की भाट जाति का राज्य था और सिंहेश्वर नाथ का मंदिर भी इन्हीं की भूमि पर अवस्थित था जिसे पंडों को इस शर्त पर दिया गया था कि मंदिर पर चढ़ावे का एक अंश प्रतिवर्ष राजा को दिया जायेगा। किन्तु भाटभौरद्ध की शक्ति का ह्रास हो जाने पर पंडों ने शर्त की अवहेलना कर मंदिर पर पूर्ण स्वामित्व कर लिया। विलुप्त होती भाट जनजाति के लोग आज भी पास के रायभीड़ आदि गांव में हैं।




1882 में साधु वरण प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तक में हिन्दुओं के तीर्थ स्थलों में सिंहेश्वर स्थान की भी चर्चा है। पण्डित झारखंडी झा ने 1935 में प्रकाशित अपनी पुस्तक भागलपुर दर्पण में सिंहेश्वर स्थान में भाट जनजातियों की प्रधानता स्वीकार की है। उनके अनुसार इस जाति के लोगों ने कुछ सन्यासियों को निकाल बाहर किया। सन्यासियों के अत्याचार से त्रस्त जनता के उद्धार हेतु उन ठाकुरोपाधि युक्त सन्यासियों को भी परसरमा के श्री हरिदत्त सिंह ने निकाल बाहर किया और मैथिल ब्राह्मणों से पूजा प्रारम्भ करायी। कालान्तर में उन्हीं मैथिल ब्राह्मणों का प्रभाव मन्दिर पर हो गया जो आज भी स्पष्ट है। वर्तमान मंदिर का पुनः निर्माण एवं जीर्णोद्धार का कार्य दरभंगा निवासी कलवार जाति के श्री हरिचरण चैाधरी ने कराया था। ब्रिगेडियर आरएच थाॅमस ने 1930 में प्रकाशित सर्वे रिपोर्ट में सिंहेश्वर स्थान का शिवालय चैाधरी हरिचरण द्वारा निर्मित बतलाया है।
1937 में दिल्ली से आये मुख्य अभियंता दल ने इस मंदिर के चार सौ फीट नीचे पहाड़ पाया था।ऐसी मान्यता है कि भूमिगत पहाड़ का उपरी भाग ही शिवलिंग है। वर्तमान शिवलिंग उपरी शतह से लगभग चार फीट नीचे अवस्थित है। 1937 में इस मंदिर के स्वामित्व को लेकर पंडों और कार्तिक प्रसाद सिंह के नेतृत्व में जनता के बीच अधिकार वाद की लड़ाई चली। मंदिर को सार्वजनिक सम्पति घोषित करने हेतु न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक दिया गया। 1945 में भागलपुर के जिला सत्र न्यायाधीश ने अपना निर्णय जनता के पक्ष में दिया। बिहार में सबसे अधिक आय देने वाला सिंहेश्वर का यह अकेला शिव मंदिर है। जबकि मंदिरों के आय में यह दूसरे स्थान पर है। इतिहास के पन्नों में अपनी महत्ता तथा पौराणिकता को समेटे सिंहेश्वर स्थान और शिवमंदिर अपने विकास हेतु आकुल आतूर है। लोग इसे पर्यटक स्थल के रूप में देखना चाहते हैं। यहां रेलवे स्टेशन की भी मांग हो रही है।




शिवरात्रि के अवसर पर आयोजित मेला बिहार का दुसरा सर्वाधिक प्रसिद्ध मेला है। इस मेला से ग्रामीण वर्ष भर के उपयोगी सामान क्रय करते हैं। सरकारीकरण के कारण इस मेला पर प्रशासन का पूर्ण नियंत्रण है और पन्द्रह दिनों तक मधेपुरा का प्रशासन यहीं से संचालित होता है। इस वर्ष मेला का उद्घाटन पुलिस उपमहानिरीक्षक चन्द्रिका प्रसाद ने किया। इस अवसर पर जिलाधिकारी मो. सोहैल आदि भी उपस्थित थे। जबकि लाखों श्रद्धालुओं ने जयकारा के साथ बाबा भोले का पूजा अर्चना और जलाभिषेक किया। जिसमें बिहार सहित पास पड़ोस के राज्यों के अलावा नेपाल के श्रद्धालू भी शामिल थे।
साभार-डॉ.देवाशीष बोस, मुख्य संपादक कोसी टाइम्स

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