पढ़िए रक्षाबंधन की पौराणिक कथा जो श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी

संस्कृति और परंपरा

इस साल 22 अगस्त, रविवार के दिन रक्षा बंधन मनाया जाएगा. बहनें रक्षा बंधन पर भाई की लंबी उम्र की कामना के साथ राखी बांधेंगी और तिलक लगाकर आरती उतारेंगी और मुंह मीठा करेंगी. भाई भी बहन को उपहार देंगे और उसे जीवन भर रक्षा का वचन देंगे. भाई-बहन का रिश्ता अनमोल होता है और प्रेम से पगा होता है.

क्या आप जानते हैं कि महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर के कहने पर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने रक्षा बंधन की पावन कथा सुनाई भी. श्री कृष्ण ने धर्मराज से कहा था कि इस कथा को सुनने वाले जातकों के सब दुख दूर होते हैं. हालांकि रक्षा बंधन को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं.

उनमें से रक्षा बंधन की एक पौराणिक कथा इस प्रकार है….

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- ‘हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है.’

भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा. असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया.

ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए. उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया. उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें. सभी लोग मेरी पूजा करें.

दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए. धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा. यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे. न तो मैं भाग ही सकता हूं और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूं. कोई उपाय बताइए.

वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा. श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया.

‘येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः.
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः’

इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया. ‘रक्षा बंधन’ के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई. राखी बांधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है.

ऐसे सजाएँ राखी की थाली….

  • सबसे पहले चांदी,पीतल, स्टील या ताम्बे की साफ स्वच्छ थाली लीजिए.
  • अब इस थाली को गंगाजल से पवित्र कीजिए.
  • थाली के दाएं तरफ गंगाजल का छोटा कलश रखें. कलश की पूजा करें.
  • थाली के बाएं तरफ विषम संख्या में राखियों को खोल कर रख लीजिए.
  • अब जो थाली में जगह बची है उसमें दाएं तरफ गंगाजल के पास एक से अधिक मिठाई रख लीजिए.
  • थाली के सामने वाले हिस्से में कुमकुम, चावल(अधिक मात्रा में), केशर के धागे, सरसो के दाने, दुर्वा, मिश्री, हल्दी, 5 लौंग, 1 सुपारी, 1 पान कोर, एक पान बीडा और 5 पूजा बादाम सजाएं.
  • 1,5,10 का सिक्का या चांदी का सिक्का साथ में रखें.
  • श्रीफल पर स्वस्तिक बना कर रखें.
  • मौली और छोटे फुंदे रखें.
  • पूजा की थाली में दही-मिश्री भी रखें. यह शुभ कार्य का प्रतीक है.
  • अब चांदी,पीतल,मिट्टी,कांसे याअन्य पवित्र धातु का दीपक लें. इस दीपक में घी में डूबी फूल बत्ती लगाएं. दीपक की पूजा करें.
  • टोपी,रुमाल या सिर ढंकने का कपडा भी रखें.
  • थाली में ड्रायफ्रूट भी रखें.
  • ताजा सुगंधित फूलों की पांखुरी भी बचे स्थान पर सहेज लीजिए.
  • धूप बत्ती त्योहार मनाने के बाद घर में जलाएं.
  • तो लीजिए आपकी राखी की थाली सज कर तैयार है.

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