राजनीति में तीन दशक से प्रासंगिक बने हुए हैं लालू यादव, बड़ा सवाल- क्‍या जमानत के बाद आएंगे बिहार?

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 राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के अध्‍यक्ष लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) को चारा घोटाला (Fodder Scam) के डोरंडा कोषागार मामले में झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) ने शुक्रवार को जमानत दे दी। करीब 75 साल के हो चुके लालू का 32 सालों के राजनीतिक जीवन (Political Life of 32 Years) में कई उतार-चढ़ाव आए और गए, लेकिन बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में वे हमेशा प्रासंगिक बने रहे। लालू चारा घोटाला के विभिन्‍न मामलों में लंबे समय तक रांची के होटवार जेल (Hotwar Jail, Ranchi) में रहे। जेल की सजा तथा उम्र व बीमारी के असर के बावजूद वे बिहार में विपक्ष की राजनीति की धुरी बने रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्‍या चारा घोटाला में जमानत के बाद वे बिहार आएंगे? उनके आने पर एक बार फिर राज्‍य की राजनीतिक गर्मी का बढ़ना तय माना जा रहा है।

बिहार की राजनीति में अहम किरदार रहे हैं लालू

समर्थन हो या विरोध, लालू बिहार की राजनीति में अहम किरदार रहे हैं। वर्तमान राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की नीतीश कुमार सरकार (Nitish Kumar Government) के रोजगार, विकास या कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दों पर बात भी लालू राज तक चली जाती है। वर्तमान सरकार के नेता लालू-राबड़ी राज (Lalu-Rabri Regime) की याद दिला अपने काम की तुलना उस काल से करते हैं। बीते विधानसभा व लोकसभा चुनावों के प्रचार को देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) व मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) सहित सत्‍ता पक्ष के सभी नेताओं के निशाने पर लालू व उनका परिवार रहा। दूसरी ओर आरजेडी ने लालू को दबे-कुचलों को आवाज देने वाला तथा गरीबाें का मसीहा बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

एमएलसी व विधानसभा उपचुनाव ने दी मजबूती

गत लोकसभा चुनाव (Lok Shabha Election) में आरजेडी को करारी हार मिलने के बाद लगा था कि बिहार में लालू प्रासंगिक नहीं रहे। उनके राजनीतिक उत्‍तराधिकारी तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े किए गए। लेकिन लालू राजनीति में बने रहे और समय के साथ मजबूत बनकर उभरे। बीते बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। इससे न केवल तेजस्‍वी का कद बढ़ा, बल्कि लालू काे भी को मजबूती मिली। हालिया बिहार विधान परिषद चुनाव (Bihar MLC Election) में आरजेडी ने छह सीटें हासिल की। इसके बाद पार्टी विधान परिषद में राबड़ी देवी (Rabri Devi) को नेता प्रतिपक्ष की जिम्‍मेदारी दिलाने में कामयाब रही। इसके तुरंत बाद बिहार विधानसभा की बोचहां सीट के उपचुनाव में भी आरजेडी ने जीत हासिल की। इन चुनावी जीतों ने आरजेडी को मजबूत कर लालू की प्रासंगिकता को भी बढ़ा दिया है।

एम-वाई समीकारण से ए-टू-जेड तक का सफर

लालू का जनता से, खासकर ग्रामीण इलाकों में ठेठ अंदाज में कनेक्‍ट करने की काबिलियत उन्‍हें दूसरों से अलग करती है। लालू ने बिहार में जातिवाद की सच्‍चाई को समझ अपनी सोशल इंजीनियरिंग में यादवों के साथ मुसलमानों को जोड़कर एम-वाई समीकरण (MY Equation) बनाया। आरजेडी के इस एम-वाई समीकरण में अब अन्‍य राजनीतिक दलों ने सेंध लगा दी है। साथ ही दलित-मुस्लिम, दलित-महादलित आदि कई नए वोट बैंक भी उभरे हैं। बताया जाता है कि ऐसे में आरजेडी ने अपने परंपरागत एम-वाई समीकरण को विस्‍तार देते हुए अब सभी जातियों व सुमदायों को साथ लेकर चलने की ‘ए-टू-जेड’ नीति बनाई है। हा‍ल के एमएलसी व विधानसभा उपचुनाव में इस नीति को सफलता भी मिली है। सत्‍ता पक्ष इसे आरजेडी का लालू की नीति से हटना मानता है, लेकिन आरजेडी के प्रवक्‍ता मृत्‍युंजय तिवारी कहते हैं कि उनकी पार्टी तो आरंभ से ही सबो को साथ लेकर चलती रही है।

सवाल यह कि जमानत के बाद बिहार आएंगे लालू

सवाल यह है कि जमानत के बाद लालू अब आगे क्‍या करेंगे? क्‍या वे पहले की तरह जेल से बाहर आने के बाद दिल्‍ली में बेटी मीसा भारती (Misa Bharti) के पास रहेंगे? या वे बिहार आकर सक्रिय राजनीति में कोई गुल खिलाएंगे? जो भी हो, इतना तो तय है कि लालू जैसे संकटमोचक के जेल से बाहर रहने का आरजेडी पर बड़ा असर पड़ेगा। बिहार विधानसभा में आरजेडी विधायकों की बड़ी संख्‍या को देखते हुए अगर वे जोड़-तोड़ की राजनीति में कामयाब हुए तो बड़े सियासी उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि, जेडीयू के प्रवक्‍ता नीरज कुमार ऐसी किसी संभावना से इनकार करते हैं।

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