राजगीर पौराणिक, एतिहासिक व धार्मिक का संगम-राजगीर, पंच पहाड़ियों से घिरी राजगीर के प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भूत नजारे

कही-सुनी

हरे-भरे घने जंगलों, प्राकृतिक दृश्यों और पांच पहाड़ियों के बीच बसा राजगीर भारत का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। राजगीर न सिर्फ एक प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल है, बल्कि एक खुबसूरत हेल्थ रेसॉर्ट के रूप में भी लोकप्रिय है। देव नगरी राजगीर सभी धर्मो की संगमस्थली है। यहां प्राकृतिक सौंदर्य के साथ विविध संस्कृतियां देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

इतिहास

राजगीर बिहार राज्य के नालंदा जिले में स्थित एक शहर एवं अधिसूचीत क्षेत्र है. यह कभी मगध साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी, जिससे बाद में मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ. पहले इसे राजगृह के नाम से जाना जाता था. वसुमतिपुर, वृहद्रथपुर, गिरिब्रज और कुशग्रपुर के नाम से भी प्रसिद्ध रहे राजगृह को आजकल राजगीर के नाम से जाना जाता है.

पौराणिक साहित्य के अनुसार राजगीर बह्मा की पवित्र यज्ञ भूमि, संस्कृति और वैभव का केन्द्र तथा जैन तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध की साधनाभूमि रहा है. इसका ज़िक्र ऋगवेद, अथर्ववेद, तैत्तिरीय पुराण, वायु पुराण, महाभारत, बाल्मीकि रामायण आदि में आता है। जैनग्रंथ विविध तीर्थकल्प के अनुसार राजगीर जरासंध, श्रेणिक, बिम्बसार, कनिक आदि प्रसिद्ध शासकों का निवास स्थान था. जरासंध ने यहीं श्रीकृष्ण को हराकर मथुरा से द्वारिका जाने को विवश किया था.

पर्यटकस्थल
गृद्धकूट पर्वत- भगवान महात्मा बुद्ध गृद्धकूट पर्वत पर बैठकर लोगों को कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए थे। जापान के बुद्ध संघ ने इसकी चोटी पर एक विशाल शांति स्तूप का निर्माण करवाया है जो आजकल पर्यटकों के आकर्षण का मूख्य केंद्र है। स्तूप के चारों कोणों पर बुद्ध की चार प्रतिमाएं स्थपित हैं। विशाल शांति स्तूप को शांति शिवालय भी कहा जाता है।

वेणुवन-बांसों के वन में बसे वेणु विहार को उस समय के राजा बिम्बसार ने भगवान बुद्ध के रहने के लिए बनवाया था। विणु विहार बहुत ही खूबसूरत जगह है।

गर्म जल के झरने-वैभव पर्वत की सीढि़यों पर मंदिरों के बीच गर्म जल के कई झरने (सप्तधाराएं) हैं जहां सप्तकर्णी गुफाओं से जल आता है। इन झरनों के पानी में कई चिकित्सकीय गुण होने के प्रमाण मिले हैं। पुरुषों और महिलाओं के नहाने के लिए 22 कुंड बनाए गए हैं। इनमें ब्रह्मकुंड का पानी सबसे गर्म (45 डिग्री से.) होता है।

स्वर्ण भंडार-यह स्थान प्राचीन काल में जरासंध का सोने का खजाना था। कहा जाता है कि अब भी इस पर्वत की गुफा के अंदर बहुत सोना छुपा है और पत्थर के दरवाजे पर उसे खोलने का रहस्य भी किसी गुप्त भाषा में खुदा हुआ है।

घोड़ा कटोरा झील – प्राकृतिक पथ

अगर आप राजगीर जाएं तो घोड़ा कटोरा झील जाने के लिए वक्त जरूर निकालें। यहां तक कोई मोटर वाहन नहीं जाता। बिहार सरकार ने प्रदूषण मुक्त रखने के लिए इसे मोटर वाहनों से पूरी तरह दूर रखा है। ये बिहार में इको टूरिज्म का सुंदर नमूना है। घोड़ा कटोरा झील के रास्ते व क्षेत्र का प्रबंधन बिहार सरकार का वन विभाग करता है।

घोड़ा कटोरा के बारे में कहा जाता है कि ये महाभारत काल में महाराजा जरासंध का अस्तबल था। विश्वशांति स्तूप के पास से घोड़ा कटोरा झील जाने के लिए तांगा बुक कराना पड़ता है। दूसरा तरीका अपनी साइकिल या किराए की साइकिल से जाना है। विश्व शांति स्तूप से घोड़ा कटोरा झील का सफर साढ़े छह किलोमीटर का है। ये रास्ता कच्ची सड़क का है। इस पर डामर बिछा दिया गया है।

ये रास्ता ही अपने आप में मनोरम है। घोड़ा कटोरा जाने के लिए तांगा का किराया प्रति व्यक्ति 100 रुपये तय है। इसमें आने और जाने का किराया शामिल है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब भी राजगीर आते हैं तो वे घोड़ा कटोरा का सफर देवेंद्र यादव के राजधानी तांगे से करते हैं। वैसे आप साइकिल से भी ये सफर कर सकते हैं। किराये की साइकिल का भी किराया 100 रुपये ही रखा गया है।

अगर आप घोड़ा कटोरा झील में विहार के लिए जाना चाहते हैं तो अपना समय सुबह का रखें। यहां तीन बजे के बाद का जाने पर रोक है। घोड़ा कटोरा झील में आप नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। प्रकृति की गोद में, अप्रतिम हरियाली के बीच घंटों नौका विहार का आनंद अविस्मरणीय रहेगा। यहां आप हवा और पानी की प्रतिध्वनि साफ तौर पर सुन सकते हैं।

यहां सैलानियों के लिए कैंटीन की सुविधा उपलब्ध है। आप अपनी पसंद के खाने पीने का सामान साथ भी ले जा सकते हैं। बिहार पर्यटन नौका विहार करने वालों के लिए लाइफ जैकेट की सुविधा उपलब्ध कराता है। यहां सुरक्षा गार्ड भी तैनात रहते हैं। नए साल और छुट्टियों के दिन घोड़ा कटोरा में सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। यहां अगर आप समूह में जाएं तो ज्यादा आनंद आएगा।

महोत्सव
राजगीर महोत्सव-हर साल तीन या चार दिन के लिए राजगीर महोत्सव का आयोजन होता है। इस महोत्सव में मगध के इतिहास की झलक कलाकार गीत, संगीत और नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। जिसको देश-विदेश से हजारों पर्यटक देखने आते हैं।

मलमास मेला-तीन वर्षो में एक बार आने वाला मलमास के दौरान राजगीर में विश्व प्रसिद्ध मेला लगता है। 365 दिनों का एक वर्ष होता है, लेकिन हर चौथा वर्ष 366 दिन का होता है जिसे मलमास या अधिवर्ष (लीप का साल) कहते हैं। पुराण के अनुसार यह मास अपवित्र माना गया है और इस अवधि में मूर्ति पूजा, यज्ञदान, व्रत, उपनयन, नामकरण आदि वर्जित है, लेकिन इस अवधि में राजगीर सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस मलमास अवधि में सभी देवी देवता यहां आकर वास करते हैं। राजगीर के मुख्य ब्रह्मकुंड के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसे ब्रह्माजी ने प्रकट किया था और मलमास में इस कुंड में स्थान का विशेष फल है।

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