बिकता है दूल्हा यहाँ, खरीदना है तो जान लीजिए चपरासी से लेकर IAS तक के रेट

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शराबबंदी के बाद गांधी जयंती के मौके पर दहेज के खिलाफ बिहार में अभियान की शुरुआत होगी। बता दें कि बिहार में दहेज के लिए लड़की वालों को लड़के वालों से शादी के पहले डील करनी पड़ती है।

डील लड़के की जॉब के अनुसार डील होती है। अगर लड़का IAS है तो दहेज की डिमांड 60 लाख रुपए तक हो सकती है और लड़का अगर फोर्थ ग्रेड प्राइवेट नौकरी करता है तो फिर डील तीन लाख कैश तक हो जाती है।

कुछ ऐसी है बिहार में दहेज लेने-देन की लिस्ट..

– दहेज के खिलाफ कानून बनाने वाला आजाद भारत में बिहार पहला राज्य था। 1950 में ही राज्य ने दहेज निरोध कानून लागू किया।

– 1961 में संसद द्वारा पारित दहेज कानून के 11 साल पहले यह कानून आया। 2015 में दहेज हत्या के 1154 मामले दर्ज हुए थे।
– संतोष सिर्फ इतना है कि ग्राफ 16% गिरा है। इसके बावजूद देश में कुल दहेज हत्या के मामलों में 15% अकेले बिहार में दर्ज हुए।

दहेज निषेध अधिकारी फिर भी कुप्रथा कायम

– दहेज निषेध कानून-1961 के तहत राज्यों को दहेज निषेध अधिकारियों को तैनात करना है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, नागालैण्ड को छोड़कर (क्योंकि वहां दहेज प्रथा नहीं) शेष सभी राज्यों में ऐसे अधिकारियों को नियुक्त किया जाना है।

– बिहार में जिला कल्याण पदाधिकारियों को यह जिम्मा है। राज्य स्तर पर महिला विकास निगम की एमडी के पास यह दायित्व है। कानून की बातें किताबों में ही हैं। आंकड़े गवाह हैं।

कार्ड देखते ही पूछते हैं क्या लिया-क्या दिया

– आप किसी के घर शादी का कार्ड लेकर जाएंगे तो लोगों का पहला सवाल होता है-तब बेटे की शादी में कितना और क्या-क्या लिया? ऐसे ही सवाल लड़की पक्ष से भी होते हैं।
– लोगों ने इसे गैरकानूनी होते हुए भी मान्यता दे रखी है। इस प्रथा को समाप्त करने के लिए एक मात्र उपाय जागरुकता और मानसिकता में बदलाव ही है।

– दहेज लेने के अपने-अपने तरीके इजाद कर रखे हैं लोगों ने। कुछ लोग कैश की जगह लड़की पक्ष से जमीन और जेवर में ही डील करते हैं।
– लड़के के नाम से जमीन लिखा लिया या कह दिया कि लड़की को इतने जेवर पहना दीजिएगा।

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दहेज का रेट, इसका वजूद मिटाना होगा

– महंगाई के साथ ही दहेज का रेट भी बढ़ रहा है। पिछले साल की तुलना में करीब 25 फीसदी का उछाल आया है। चपरासी से लेकर आईएएस तक सब का रेट तय है।

– बिहार में दहेज के रेट अपनी पड़ताल के दौरान कई लोगों से संपर्क किया गया। इनमें वैसे लोग भी हैं जिन्होंने हाल ही में अपनी बेटी की शादी की है या वर की तलाश में हैं। इनसे बातचीत के दौरान दहेज के रेट की तस्वीर भी सामने आई।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

– समाजशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं कि बिहार में दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियों की जड़ यहां के सामंती मिजाज में हैं। इसके बीज अंग्रेजी राज के स्थायी बंदोबस्त वाले इलाकों में ज्यादा अंकुरित हुए। समय के साथ फैले।

फसल आज भी बोई-काटी जा रही है। धर्मशास्त्र की आड़ लेने वाले भी हैं, जो कहते हैं 10-11 की उम्र तक बच्ची गौरी-पार्वती रहती है और रजस्वला होते ही उसकी शादी कर देनी चाहिए।

– यह पुरातनपंथी सोच है। उस समय की जब विज्ञान नहीं था। विज्ञान ने इस सोच को ही तर्कहीन बना दिया है। पहले तो महिलाओं के हाथ में ही सत्ता थी।

– धीरे-धीरे उन्हें उत्पादन व्यवस्था से पीछे ढकेला गया। एंगेल्स के मुताबिक महिलाओं को पहले खेती से अलग कर पशुपालन तक सीमित किया गया, फिर चूल्हे तक और फिर बच्चे संभालने तक।

– यह विकृति पुरुषों ने ही पैदा की। लेकिन औद्योगिक क्रांति के दौर में मसल्स की ताकत मशीनों में रुपांतरित हुई तो महिला-पुरुष समानता की बहस छिड़ी। 18वीं सदी से जोर पकड़ने लगी और यह लगातार आगे बढ़ रही है।

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