प्रथम राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से जुड़ी कुछ चीजें, जो आज भी देती हैं टीस

जानकारी

 देश के प्रथम राष्‍ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद  से जुड़े कई प्रसंग ऐसे हैं, जो किसी को भी गर्व करने का मौका देते हैं, तो कुछ प्रसंग ऐसे भी हैं, जिन्‍हें यादकर मायूसी होती है। मूलत: बिहार के सिवान (तब का सारण (छपरा)) जिले जिरादेई में जन्‍मे भारत के इस लाल का पूरा जीवन एक खुली किताब है। राजेंद्र बाबू अपने दौर के उन चुनिंदा नेताओं में थे, जिनका व्‍यक्तित्‍व तत्‍कालीन भारत की आत्‍मा को प्रकट करता था। उनके स्‍मृति दिवस के मौके पर बिहार के राज्‍यपाल फागु चौहान, मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्‍यमंत्री तार किशोर प्रसाद, उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन आदि ने बांस घाट स्थित स्‍मारक पर जाकर श्रद्धांजलि दी।

राजेंद्र बाबू जैसा सादगी पसंद नेता होना किसी-किसी के लिए ही संभव हो सका। उन्‍होंने अपने जीवन के आखिरी पल पटना के सदाकत आश्रम में गुजारे। उनका जन्‍म तीन दिसंबर 1884 को पैतृक गांव जिरादेई में पिता महादेव सहाय और माता कमलेश्‍वरी देवी के घर हुआ था। 28 फरवरी 1963 को पटना के सदाकत आश्रम में उनका निधन हो गया। यहां उनकी चप्‍पल, कुर्सी और पलंग आज भी ठीक वैसे ही लगा हुआ है, जिसे देखकर लगता है कि राजेंद्र बाबू कहीं से घूमते-फिरते आएंगे और बैठ जाएंगे। गंगा के किनारे स्थित यह जगह गांधीवादियों के लिए आस्‍था का बड़ा केंद्र हैं। राजेंद्र बाबू खुद भी गांधी जी को खूब सम्‍मान देते थे। उनका जीवन गांधीजी से काफी हद तक प्रभावित रहा।

बताया जाता है कि राजेंद्र बाबू को दमा की बीमारी थी। राष्‍ट्रपति पद के लिए कार्यकाल पूरा करने के बाद जब वे पटना के सदाकत आश्रम में आकर रहने लगे तो उनकी बीमारी बढ़ती गई। उम्र के आखिरी पड़ाव में देश के पहले राष्‍ट्रपति को इस बीमारी के कारण काफी तकलीफ झेलनी पड़ी। कई लोग दावा करते हैं कि तत्‍कालीन सरकार ने उनकी सेहत पर ठीक तरीके से ध्‍यान नहीं दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से कई मसलों पर उनके मतभेदों की चर्चा अब अधिक खुलकर होती है। कई लोग तो आखिरी वक्‍त में राजेंद्र बाबू की अनदेखी के लिए नेहरू को ही जिम्‍मेदार ठहराते हैं।

बिल्‍कुल ठेठ गंवई अंदाज वाले राजेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन काल में कई उपलब्‍ध‍ियां खुद के लिए और समाज के लिए हासिल कीं, लेकिन देश के सर्वोच्‍च पद पर आसीन होने यानी राष्‍ट्रपति बनने के बाद उनका रहने-खाने, चलने-फिरने, लोगों से मिलने और बातें करने का अंदाज बिल्‍कुल भी नहीं बदला। राजेंद्र बाबू के पैतृक गांव में उनकी स्‍मृतियों को सहेजने के लिए कोई ठोस प्रयास अब तक नहीं हुआ। पिछले कुछ दिनों में पटना हाई कोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया है। पटना हाई कोर्ट ने प्रथम राष्‍ट्रपति से जुड़ी स्‍मृतियों और स्‍मारकों के संरक्षण के लिए कार्ययोजना बनाने का निर्देश सरकार को दिया है और इस पर रिपोर्ट भी मांगी है।

नई पीढ़ी के लिए कुछ महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

  • जिरादेई से शुरू की पढ़ाई
  • जिला स्‍कूल, छपरा के छात्र रहे
  • 18 साल की उम्र में पास की कोलकाता विवि की प्रवेश परीक्षा
  • कोलकाता के प्रेसिडेंसी कालेज से ला में डाक्‍टरेट किया
  • हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और बंगाली पर था समान नियंत्रण
  • 13 वर्ष की उम्र में ही राजवंशी देवी से हो गया थ विवाह
  • सुखी रहा वैवाहिक जीवन, पढ़ाई भी चलती रही
  • वकील के तौर पर शुरू किया करियर
  • महात्‍मा गांधी से गहरे तक थे प्रभावित
  • कम से कम दो बार बने कांग्रेस के अध्‍यक्ष
  • आजादी से पहले की सरकार में रहे मंत्री

पटना हाई कोर्ट ने गत दिनों प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद के स्मारकों की बदहाली पर राज्य सरकार के कदमों की समीक्षा की। मुख्य न्यायाधीश संजय करोल एवं न्यायाधीश एस कुमार की खंडपीठ ने विकास कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हालात की जानकारी ली। इस दौरान रेलवे एवं राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि जीरादेई (सिवान) के समीप ओवरब्रिज निर्माण की सहमति बन गई है। मालूम हो कि पिछली सुनवाई में रेलवे ने राज्य सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि ओवरब्रिज की लागत में बराबर की भागीदारी करें।

महाधिवक्ता ललित किशोर ने कोर्ट को बताया कि रेलवे के इस प्रस्ताव को राज्य सरकार ने मानते हुए मंजूरी दे दी है। पटना के जिलाधिकारी ने कोर्ट को बताया कि बिहार विद्यापीठ से अतिक्रमण हटाने के लिए संबंधित रिकार्ड और कागजात उपलब्ध करवाने में प्रबंधन का सहयोग नहीं मिल रहा है। इस पर कोर्ट ने बिहार विद्यापीठ को भूमि से जुड़े सारे कागजात और रिकार्ड जि़ला प्रशासन को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। अगली सुनवाई तीन मार्च को होगी।

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