पॉलीथिन से मुक्ति के लिए 90 लाख खर्च, फिर भी खुलेआम हो रहा इस्तेमाल

जानकारी

पॉलीथिन आज सबसे बड़ी सिरदर्द बन गई है। नष्ट नहीं होने के कारण यह भूमि की उर्वरा क्षमता को खत्म कर रही है। साथ ही इससे भूजल स्तर भी घट रहा है। इसके उपयोग से सांस और त्वचा संबंधित रोगों के साथ ही कैंसर का खतरा भी बढ़ रहा है। पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने को लेकर नगर निगम ने कई कार्य किए। लोगों को जागरूक करने में नगर निगम ने 90.76 लाख रुपये खर्च किए थे। उसके बाद भी शहर के लोगों पर थोड़ा सा भी असर नहीं पड़ा। लोग खुलेआम पॉलीथिन का इस्तेमाल कर रहे हैं। शहर में पॉलीथिन का इस्तेमाल सब्जी विक्रेता से लेकर बड़े-बड़े मॉल में भी किया जा रहा है। दुकानदारों द्वारा धड़ल्ले से पॉलीथिन में सामान दिया जा रहा है। सब्जी बाजार व किराना दुकान में काफी कम माइक्रोन की पॉलीथिन उपयोग में लाई जाती है। यह पर्यावरण के लिए अधिक घातक होती है। स्वच्छता रैंकिग में पॉलीथिन का निष्पादन भी अहम कड़ी है। अगर शहर पॉलीथिन मुक्त है तो अंक बेहतर आ सकते हैं। गीत-कविताओं के माध्यम से किया गया था जागरूक :

शहर को पॉलीथिन मुक्त करने को लेकर निगम ने लोगों को गीत व कविता के माध्यम से लोगों को जागरूक किया था। देश के नामचीन कवियों व गायकों द्वारा कार्यक्रम किए गए थे। एक पखवारे तक लोगों को जागरूक किया गया था, लेकिन थोड़े दिन ही इसका प्रभाव देखने को मिला। उसके बाद स्थिति यथावत बन गई। हमेशा जाम होता है नाला :

 

पॉलीथिन से सबसे अधिक परेशानी सफाई कर्मियों को हो रही है। लोग पॉलीथिन का इस्तेमाल कर नाले व नाली में फेंक देते हैं, जिससे नाला हमेशा जाम कर जाता है। नाला खुला रहने के कारण लोग पॉलीथिन को आसानी डाल जाते हैं, इससे पानी का बहाव बंद होता है। नाले का गंदा पानी सड़क पर बहने लगता है। मवेशी बनाते हैं पॉलीथिन को निवाला :

शहर में कचरे के ढेर में पॉलीथिन की मात्रा काफी अधिक रहती है। कचरे के ढेर पर पशु विचरण करते रहते हैं। इस दौरान वे विभिन्न सामग्री के साथ पॉलीथिन भी खा लेते हैं। इससे पशुओं को तरह-तरह के रोग भी हो सकते हैं। इसे देखने वाला कोई नहीं है। पूरे दिन कचरे के ढेर पर पशु विचरण करते रहते हैं। शहर में प्रत्येक दिन 288 टन कचरा निकलता है। कचरा में आधी से अधिक पॉलीथिन रहती है।

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