अपनी ज़िन्दगी बचने की कोशिश में तुम बहते हो तो बह जाओ, लालू-नीतीश और शरद को तो अपनी सत्ता बचानी है

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उत्तर बिहार के करोड़ों मतदाताओं को आज का दिन याद रखना चाहिये। याद रखना चाहिये कि जब वे भीषण बाढ़ के बीच डूब और उतरा रहे थे तो उनके राजनीतिक रहनुमा अलग ही कोशिशों में जुटे थे। सुशासन बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार अपनी पार्टी को NDA में शामिल करके अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित कर रहे थे।

गरीब गुरबों और सामाजिक न्याय के योद्धा लालू प्रसाद अपने पुत्रों को सत्ता से बाहर किये जाने का बदला लेने के लिये जनता को भड़काने की कोशिश कर रहे थे। वहीं शरद, जिन्हें कोसी की धरती ने राजनीतिक पनाह दी, दुनिया को बता रहे थे कि जदयू पर पहला हक उनका है। जीवन के आखिरी पड़ाव में वे एक और चांस ले रहे थे कि कहीं राजनीति उन्हें फर्श से फिर अर्श पर न बिठा दे।

इन तीनों को मालूम था कि जनता तबाही झेल रही है, पहला काम इन्हें राहत पहुंचाना है। मगर वे यह मान कर चल रहे थे कि पहले अपना राजनीतिक कैरियर दुरुस्त करना जरूरी है। दुर्भाग्यवश ये तमाम लोग भूल गए हैं, कि राजनीतिक करियर दुःख की घड़ी में जनता के बीच खड़े होने से बनता है। तात्कालिक वजहों से स्वार्थपरायणता में पड़ने से नहीं।









इन्हें भूलने दीजिये, जो कर रहे हैं करने दीजिये। बस याद रखिये। आप याद रखिये कि इनकी प्राथमिकता में आप लोग नहीं हैं। हम लोग नहीं हैं। बस कुर्सियां हैं। यह कभी मत भूलिएगा। कभी मत। मौका मिले तो जरूर बदला लीजिये। जरूर…














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