नरेंद्र मोदी दे सकते हैं नीतीश कुमार को विशेष राज्य का मन चाहा वरदान

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पटना:  सूबे में सियासत की सूरत तो बदल गई है पर नज़रें नई हुकूमत की करनी पर हैं. उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बढ़ गई हैं. मोदी ने 2015 विधानसभा चुनाव के दौरान एक नारा दिया था बिहार और केंद्र में हो एक सरकार. उनकी ये मुराद बिना चुनाव हुए पूरी हो चुकी है. छठी बार सीएम बने नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी विकास के दो पहिए साबित हो सकते हैं. लगभग 20 साल बाद राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकार बनी है. 1998 के बाद पहली बार ये संयोग बना है. तब केंद्र में संयुक्त मोर्चे की सरकार थी. 1996 से 1998 के बीच एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के पीएम रहते बिहार में लालू की पार्टी सत्ता में थी. उसके बाद केंद्र में एनडीए की सरकार थी और 2004 तक बिहार में राजद की सरकार. जब 2005 में नीतीश कुमार की अगुआई में सूबे में एनडीए की सरकार बनी तो केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए की सरकार बन गई.

 

किया मोदी का विरोध फिर अचानक 2013 में राजनीतिक समीकरण बदला. नीतीश ने नरेंद्र मोदी को पीएम प्रत्याशी बनाने का विरोध किया. 2014 में मोदी की अगुआई में भारी बहुमत से एनडीए की सरकार बनी. इधर, नीतीश ने मंडल काल के पुराने साथी लालू की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और वो यूपीए में शामिल हो गए. 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश की अगुआई में महागठबंधन को भारी सफलता हासिल हुई. पर केंद्र और राज्य के बीच तकरार जारी रही. लेकिन, महज 20 माह में महागठबंधन तोड़ नीतीश फिर से बीजेपी के साथ हो गए हैं. इसके साथ ही 20 साल पुराना बे-मेल खत्म हो गया है. अब केंद्र और राज्य दोनों में एनडीए की सरकार है.

 

विकास का रफ्तार बढ़ने की उम्मीद दो दशकों के बाद मिले इस संयोग से गठबंधन की पटरी पर विकास की गाड़ी सरपट भाग सकती है. कृषि आधारित इस राज्य में औद्योगिक विकास की बुनियाद की आस पूरो हो सकती है. पिछले दो वर्षों में प्रदेश के विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई थी. 2017 में विकास दर 7.6 प्रतिशत तक गिर गई जो 2005 से 2014 तक हमेशा दस प्रतिशत से ज्यादा रही. सियासी फिजा बदलने से अब नई उम्मीद जगी है. 2015 में नरेंद्र मोदी ने बिहार को 1.25 लाख करोड़ रुपए का पैकेज देने का वादा किया था लेकिन नीतीश कुमार की मांग विशेष राज्य का दर्जा देने की रही है. ये दर्जा मिलने से केंद्रीय राजस्व में बिहार की हिस्सेदारी बढ़ेगी. साथ ही मनरेगा मजदूरी के भुगतान जैसे लटके मुद्दे सुलझ सकते हैं.

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