ठिठुरी सी सर्दी और दीपक जलने का पहर था, ढलती उम्र की एक महिला और एक सेठ में कुछ कहासुनी हो रही थी।
मैंने थोड़ा रुक कर जानना चाहा तो देखा कि वह महिला हमारे घर से कुछ दूरी पर रहने वाली महिला हैं जो थोड़ी स्वाभिमानी सी थी पर आज नाजाने आज क्यों इस सेठ के सामने गिरपरता कर रही थी ।

कुछ पल जो मैं रुकी तो मालूम हो चला किस्सा एक पाज़ेब का है ।
मोटा भारी भरकम सलेटी रंग से रंगा हुआ वह पाज़ेब चाँदी का मालूममात होता था।

अपनी स्वर्गीय माँ की पाज़ेब की आज वह कीमत लगा रही थी, जिसे उसकी माँ ने उम्र भर कमाया था और अपनी बेटी की बिदाई के वक़्त अपने हाथ से उसे पहनाया था।
जान से ज़्यादा सम्भाल कर रखती थी वह, पाज़ेब को ना आजतक किसी को छुने दिया ना धूल सा भी इकट्ठा हुआ था कभी ।

मैं कुछ हैरत में थीं अपनी चीज़ों का इस कदर ध्यान रखने वाली यह स्वभमानी औरत इस धनी सेठ के सामने क्यों गिड़गिड़ा रही है।

ख़ैर, अन्तः वार्ता अपने आख़िरी मुकाम पर पहुंची और सेठ के आख़िरी चंद शब्द सुनाई दिए ” बस करो चाची, नहीं होगा माफ करो!” और बाहर का रास्ता दिखाया गया, ताई मायुस सी होकर बाहर आई।

मैंने भी अपना धर्म निभाया चरणस्पर्श करती हुई उनका हालचाल पुछा और अपना बताया।
बातों बातों में पता लगा कि वजह क्या थी अभी चंद मिनटों पहले के दृश्य की।

जिस पाज़ेब को उन्होंने ज़िन्दगी भर संभाल कर रखा था, आज उसे बेच रही थी .. ना ना अपने स्वार्थ में नहीं जवान बेटी जो ब्याह रही थी।
घर, परिवार,लड़का, शादी के कपड़े, तैयारियां, रसोइया, गहने जेवर सबकुछ आख़िरी चरण पर था,
पर बेटी को सोने की बालियां चाहिए थी, पैसे कम थे और सबकुछ लगभग कर्ज में।

बातों बातों में कब ताई का घर आया पता भी ना चला, उन्होंने फिर कोशिश करूँगी कहकर बिदा लिया ।

मैं भी अपने घर को हो चली, लौटते वक्त रास्ते में बस मैं यही सोच रही थी-

“एक माँ जो मिटा देती है ख़ुदकी ख्वाइशें जिस बेटी के लिए, वह बेटी ही पूछती है, तुमने क्या किया है माँ मेरे लिए ।।”

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