Patna Chand agrawal

कभी रोड के किनारे बेचते थे पकौड़ा, Patna आने पर बदली किस्मत, आज है 50 करोड़ का सालाना टर्न ओवर

खबरें बिहार की

कभी रोड के किनारे मां के साथ पकौड़े बेचते थे। आगे बढ़ने के लिए जी तोड़ मेहनत करते रहे। राजस्थान से बिहार की राजधानी Patna आये। मेहनत का फल मिला और कामयाबी कदम चूमने लगी। आज इनका सालान टर्न ओवर है 50 करोड़ रुपये। ये कहानी है पटना के मशहूर ज्वेलरी कारोबारी चांद बिहारी अग्रवाल की।

चांद बिहारी अग्रवाल के जयपुर रहने वाले हैं। कभी उनका खुशहार था। लेकिन अचानक उनके घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी। खाना खर्चा जुटाना मुश्किल हो गया। ये 1966 की बात है। उस समय चांद बिहारी महज 10 साल के थे। घर चलाने के लिए उनकी मां और बड़े भाई रतन सड़क के किनारे पकौड़े बेचा करते थे।

जब चांद बिहारी 12 साल के हुए तो जयपुर में ही एक साड़ी की दुकान पर सेल्समैन के रूप में काम करने लेगे। इस काम से उन्हें हर महीने 300 रुपये मिलते थे। 1972 में उनके बड़े भाई रतन की शादी हो गई। शादी में रतन को भेंट में 5000 रुपये मिले थे। रतन ने जयपुर में 18 चंदेरी साड़ियां खरीदीं और अपने एक संबंधी की सलाह पर पटना आ गये।

पटना में आकर रतन ने सैंपल के तौर पर कुछ दुकानदारों के ये साड़ियां दिखायीं। Patna में ये साड़ियां काफी पसंद की गईं। इसके बाद उन्होंने जयपुर से साड़ियां लाकर पटना में बेचने का काम शुरू कर दिया। पटना में ही रतन की ससुराल है।

धीरे-धीरे रतन का काम बढ़ता गया और उन्हें मदद के लिए कुछ लोगों की जरूरत महसूस होने लगी। उन्होंने 1973 में चांद बिहारी को अपने पास पटना बुला लिया। दोनों भाइयों के पास पैसे तो ज्यादा नहीं थे, लेकिन उनके सपने बहुत बड़े थे। उन्होंने Patna रेलवे स्टेशन के पास फुटपाथ पर ही अपनी दुकान शुरू कर दी। गर्मी के दिनों में फुटपाथ पर दुकानदारी बहुत मुश्किल होती थी। ग्राहकों को बुलाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी।

पटना में राजस्थानी साड़ियां बेचने वाले वे अकेले दुकानदार थे। कुछ कुछ साडियां बिकने लगीं। फिर वे दुकानों पर जा-जाकर लोगों ऑर्डर लेने लगे। कुछ आमदनी बढ़ी तो किराये पर एक दुकान भी ले ली। फिर तो किस्मत बदल गयी। दुकान से हर महीने नब्बे हजार की बिक्री होने लगी। लेकिन दुर्भाग्य से 1977 में उनकी दुकान में चोरी हो गई।

इसी साल चांद बिहारी की शादी हुई थी और खून-पसीने की कमाई से खड़ा किया हुआ पूरा बिजनेस धाराशाई हो गया। लगभग 4 लाख का नुकसान हुआ। इसके एक साल पहले ही रतन ने भी साड़ी का काम छोड़कर रत्न और आभूषण का काम शुरू कर दिया था।

इसके बाद रतन ने चांद बिहारी को संभाला और उनसे ज्वैलरी में हाथ आजमाने को कहा। उन्हें इस बिजनेस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन रतन ने उन्हें सब समझाया। उन्होंने पांच हजार रुपये से रत्न और आभूषण की दुकान शुरू की। उनकी किस्मत अच्छी निकली और उनका यह बिजनेस भी चल पड़ा। इसके बाद चांद बिहारी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1988 में इसी धंधे की बदौलत उन्होंने दस लाख की पूंजी इकट्ठा की और सोने के व्यापार में कदम रख दिया। अच्छी क्वॉलिटी और भरोसे के दम पर चांद बिहारी ने यूपी और बिहार में अपना नाम जमा लिया। 2016 में उनका टर्नओवर लगभग 17 करोड़ था। उनकी छोटी सी दुकान आज एक बड़ी कंपनी बन गई है। एक साल पहले ही उन्हें सिंगापुर में ऑल इंडिया बिजनेस ऐंड कम्यूनिटी फाउंडेशन की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है।

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