पानीपत से बिहार लौटे मजदूरों की सामने आई पीड़ा, कहा- अब परदेश नहीं जाएंगे

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कोरोना (Corona) ने समाज के हर तबके के लोगों की जिंदगी पर प्रभाव डाला है. चाहे वह प्रवासी मजदूर हो, छात्र या कोई और हो. महामारी के इस संकट ने लोगों के जीने के तरीके को ही बदल कर रख दिया. ऐसे ही कुछ लोगों ने अपनी व्यथा सुनाई. इनमें लॉकडाउन के बाद बड़ी मुश्किल से हरियाणा के पानीपत से लौटे मजदूरों के एक जत्था भी शामिल है. इनके सवालों का एक जवाब सुन आप भी कुछ देर तक सोचने को मजबूर हो जाएंगे. आखिर क्यों घर छोड़कर बाहर कमाने गए? इन सबका जवाब मजबूरी ही था.


लॉकडाउन के दौरान दिखाया बाहर का रास्ता
मजदूर बताते हैं कि कभी पैसे के खातिर अपना घर-परिवार छोड़ कर परदेश कमाने गए थे. मगर अब उसी पैसे की कमी के चलते गांव लौटने को मजबूर हैं. ज्यादातर मजदूरों का कहना है कि जहां नौकरी कर रहे थे, लॉकडाउन के चलते वहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसके बाद जब पैसा था तबतक जिंदगी चल रही थी. मगर जैसे जैसे पैसे खत्म होते चले गए घर लौटने के अलावा कोई और रास्ता नहीं रह गया था. घर आए इन लोगों के चेहरे पर परिवार की परवरिश की चिंता भी है. इन प्रवासियों का कहना है कि कम ही कमाएंगे, घर में ही कमाएंगे मगर अब ऐसी स्थिति में परदेश नहीं जाएंगे.

घर लौटने पर मजदूरों ने सुनाई अपनी व्यथा, बड़ी मुश्किल से लौटे घर

पकरीबरावां के एरुरी गांव के लाल बाबू प्रसाद, जितेंद्र कुमार, काशीचक के उपरावां के कृष्ण कुमार, कौआकोल के पाली गांव के शुभम, नारदीगंज के पन्छेका गांव की सकुंता देवी आदि ने बताया कि वे पिछले सात-आठ सालों से हरियाणा के पानीपत में सूता फैक्ट्री में काम कर रहे थे. लॉकडाउन के चलते कामकाज ठप हो गया था. नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. पैसे की कमी के कारण वापस लौटने को मजबूर होना पड़ा. खाने को कुछ नही बचा था लिहाजा घर वापस लौटने की ठानी. लिहाजा पैदल इस लंबे सफर पर निकल गए. सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल तय की. बीच रास्ते में कभी ट्रैक्टर तो कभी मालवाहक वाहनों का सहारा लिया. आरजू-विनती करते हुए उन वाहनों के सहारे भी दूरी तय की. रास्ते में खाने-पीने को जो मिला, खा लिए. इस दौरान सभी को काफी परेशानी हुई.

अंत मे घर वाले ही आये काम
मजदूरों ने एक सुर में कहा कि घर लौटने के पीछे केवल एक ही मकसद था कि जब सभी तरफ से जीने का सहारा खत्म हो गया तो अंत मे घर ही एक सहारा बचा था. पैसे की कमी घर मे ही रहने के कारण हमलोग बाहर कमाने गए थे. मगर इस मुसीबत में घर ही सबसे ज्यादा काम आया. मजदूरों को इस बात कि कसक जरूर है कि घर पर काम की कमी जरूर है. मगर किसी तरह घर पर ही रहकर खेती किसानी कर घर वालों का पेट पालेंगे.

वापस लौटने की है खुशी
हालांकि उनके प्रखंड स्थित क्वारन्टीन सेन्टर में इन सभी मजदूरों को निर्धारित समय तक रखा जाएगा,मगर सभी इस बात से बहुत खुश है कि अब वो अपने घर लौट चुके है.

Sources:-News18

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