बिहार के नवादा जिले में है देश का एकलौता गांव, हर जाति के लिए है अलग-अलग मंदिर

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क्या आपने किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है जहां हर जाति के लिये अलग-अलग मंदिर हो। आज हम आपको बता रहे हैं बिहार के एक ऐसे ही गांव की कहानी जहां हर जाति के लिये अलग-अलग मंदिर की व्यवस्था है। अपने आप में ये शायद देश का पहला गांव है जहां मंदिरों का बंटवारा जाति और बिरादरी के नाम पर हुआ है। अब आप सोचेंगे कि अलग-अलग मंदिरों की व्यवस्था का कारण लोगों का आपसी द्वंद्व या विवाद होगा, लेकिन अगर आप ऐसा सोचते हैं तो ये बिल्कुल गलत है क्योंकि आज तक इस गांव में कभी भी कोई जाति या बिरादरी को लेकर विवाद नहीं हुआ है। बिहार के नवादा जिले के मेसकौर प्रखंड का छोटा सा गांव सीतामढ़ी मंदिरों की अलग-अलग व्यवस्था के कारण अपनी अलग पहचान रखता है।

इस गांव में माता सीता का मंदिर इकलौता मंदिर है जहां सभी जाति के लोग पूजा करने के लिए जाते हैं अन्यथा जो लोग जिस जाति से ताल्लुकात रखते हैं वो उसी जाति के लिये बने मंदिर में पूजा अर्चना करने जाते हैं। इन मंदिरों में उसी जाति के लोग पुजारी भी होते हैं। यानि जिस जाति का मंदिर उसी जाति का पुजारी। वैसे तो इस गांव में लगभग सभी जाति के लोगों के मंदिर हैं मगर मुख्य रूप से इस गांव में 22 मंदिर हैं जो आजादी से पहले और बाद में बनाये गये हैं।

इस गांव में आजादी से पूर्व भी कुछ मंदिरों का निर्माण कराया गया था जैसे कबीर मठ मंदिर इस गांव का सबसे पुराना मंदिर है। यह रविदास समाज का मंदिर है और इसके पुजारी सुरेश राम हैं। लाइव बिहार की रिपोर्ट के अनुसार राजवंशी ठाकुरबाड़ी में भगवान बजरंगबली की मूर्ति है लेकिन इसके भक्त और पुजारी दोनों राजवंशी समाज के हैं। इसी प्रकार चंद्रवंशी समाज का भी अपना मंदिर है और उसमें उनके कुल देवता जरासंध के अलावा भगवान राम-लक्ष्मण और हनुमान की भी प्रतिमा स्थापित है।

इसी प्रकार से चौहान समाज का चौहान ठाकुरबाड़ी, बाल्मीकि मंदिर कोयरी समाज के लिए, चौधरी जाति के लिए शिव मंदिर, सोनार जाति के भगवान विश्वकर्मा मंदिर, यादवों के लिए राधा-कृष्णा मंदिर बने हुए हैं। गांव के लोगों से जब हमने जानना चाहा तो अजय चंद्रवंशी ने बताया कि हमारा यह गांव सामाजिक सद्भाव का मिशाल पेश कर रहा है। अलग-अलग जातियों के मंदिर होते हुए भी इस गांव के लोग सामाजिक सद्भाव का मिशाल पेश कर रहे हैं ।

आज तक जाति को लेकर इस गांव में किसी की भी दूसरे से लड़ाई नहीं हुई ।गांव के ही उपेन्द्र राजवंशी का कहना है कि यह परम्परा पिछले कई पीढ़ियों से चलती आ रही है। यह गांव अनेकता में एकता का सन्देश दे रहा है। हिन्दू कैलेंडर के अगहन पूर्णिमा के दिन समाज के लोग आपस में मिलते हैं और गांव और समाज की भलाई के लिए निर्णय लेते हैं। लग्न के मौसम में भी समाज की बेटियों की शादी उसी समाज के मंदिर में होती है।

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