थियेटर हो, सीरियल हो या फिर सिनेमा. कलाकार को अपनी कला का प्रदर्शन हर जगह करना होता है. उसे हर जगह अपनी एक्टिंग का सौ प्रतिशत देना होता है. एक्टर विजय कुमार को बहुत कम लोग उनके नाम से जानते हैं, लेकिन जैसे ही स्टार भारत के फेमस सीरियल निमकी मुखिया के ठाकुर साहब के रोल के बारे में चर्चा होती है तो लोग उन्हें पहचान जाते हैं. बहुत कम लोगों को पता है कि निमकी मुखिया के ठाकुर साहब यानि विजय कुमार पटना के रहने वाले हैं. सुजीत कुमार से विजय कुमार की हुई बातचीत के प्रमुख अंश.

पटना से मुंबई तक का सफर आपने कैसे किया?
मेरा मूल निवास पटना के नौबतपुर ब्लॉक के छोटकी कोपा गांव में है. शुरू में पढ़ाई पर ध्यान था तो बिहार में पढ़ने के बाद दिल्ली चला गया. 1991 से लेकर 94 तक अपने एमएससी को पूरा किया उसी बीच एफटीआई की तरफ से पहली बार केवल एक साल के लिए कोर्स लांच हुआ था. जिसमें छह माह तक प्रैक्टिकल भी था. उसे भी कर लिया. यह सिलसिला चलता रहा. इसी क्रम में सन् 2000 में ब्रिटेन के निवासी चार्ल्स वैलेस के नाम पर फेलोशिप भी मिल गया. यह फेलोशिप वैसे भारतीय छात्रों को मिलता है जो कला के क्षेत्र में कार्य करते हैं. हालांकि शुरू के दिनों में पटना में थियेटर भी किया. ग्रुप बनाया और करीब 15 थियेटर भी किया. एनएसडी के एक्सटेंशन प्रोग्राम में विजिटिंग फैकल्टी भी रहा. करीब 60 से ज्यादा नाटकों को निर्देशित किया. हरिशंकर परसाई लिखित हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं का एकल शो किया. 2003 में एनएसडी की तरफ से मुंबई आया और यहीं का होकर रह गया.

मुंबई में पहला मौका कैसे मिला? कितने फिल्मों में आपने काम किया है?
एक ग्रुप है डायरेक्टर्स ग्रुप नाम का. वो स्टार प्लस के लिए चांद छुपा बादल में सीरियल शुरू कर रहे थे. यह 2010 की बात है. इसमें मुझे पहली बार काम मिला. फिर परेश रावल के प्रोडक्शन हाउस के लिए एक शो किया. इसी क्रम में चंद्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म काशी का अस्सी में भी मौका मिला. फिर रोल मिलते गये. सिंह साहब द ग्रेट, श्री राम राघवन की एजेंट विनोद, बजरंगी भाईजान, अनारकली ऑफ आरा जैसी कई फिल्मों में काम किया. अभी सोन चिरैया और अनुराग कश्यप के हाउस की फिल्म बमफाड़ में काम कर रहा हूं.

निमकी मुखिया के ठाकुर साहब का किरदार कैसा रहा?
अनुभव के तौर पर यह किरदार बहुत उम्दा है. जब एक राइटर अच्छे तरीके से लिखता है तो किरदार अहम हो जाता है. इसके साथ यही है. अच्छी राइटिंग होती है तो चीजें सहज होती हैं. ठाकुर साहब के किरदार ने मेरी मेहनत पर मुहर लगा दिया.

एक किरदार के लिए रोल अहम होता है या फिर रोल की लंबाई ?
दोनों ही चीजें मायने रखती हैं. किरदार के लिए यह जरूरी होता है कि एक ऐसा कैरेक्टर हो जिसका प्रोपर लेंथ हो. बाकी तो मेहनत पर निर्भर करता है. उस कैरेक्टर को बेहतर तरीके से निभा दिया तो दर्शक नोटिस कर ही लेंगे.

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