मुंडेश्वरी धाम में रोजाना 3 क्विंटल तांडुल प्रसाद की बिक्री, नीतीश ने 10 साल पहले फिर शुरू करवाई थी सदियों पुरानी परंपरा

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बिहार के प्रसिद्ध मां मुंडेश्वरी धाम में नवरात्रि के दौरान रोजाना ढाई से तीन क्विंटल ‘तांडुल’ प्रसाद की बिक्री हो रही है। कैमूर की पंवरा पहाड़ी पर स्थित मंदिर में मां भवानी मुंडेश्वरी को तांडुल (चावल) का भोग लगाने की परंपरा प्राचीन है। कोलकाता म्यूजियम में संरक्षित मुंडेश्वरी शिलालेख में उल्लेखित है कि तत्कालीन दंडनायक गोमी भट्ट द्वारा मंदिर के कुलपति रहे भागुदलन को मंदिर को 50 दीनार (मुद्रा) दान किए थे। वह दान विनितेश्वर के मंदिर (मुंडेश्वरी मंदिर) में दीप जलाने एवं तांडुल प्रसाद का नियमित भोग लगाने के लिए था। सदियों पुरानी ये परंपरा कालांतर में बंद हो गई थी, 10 साल पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तांडुल प्रसाद के भोग की परंपरा फिर शुरू करवाई थी।

बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद ने साल 2008 में राष्ट्रीय स्तर के पुरातत्वविदों एवं इतिहासकारों से शोध कराया था। इसमें शिलालेख की तिथि 108 ई. से लेकर 636 ई. के बीच की बताई गई, जिससे पता चलता है कि मुंडेश्वरी मंदिर में तांडुल प्रसाद की परंपरा करीब 1500 से 1900 साल पुरानी है। धार्मिक न्यास परिषद के तत्कालीन प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल ने 2012 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों से वर्षों पुरानी, लेकिन कालांतर में बंद हो चुकी तांडुल प्रसाद के भोग लगाने की परंपरा को फिर से शुरू कराया था।

जब मुख्यमंत्री नीतीश तांडुल के भोग लगाने की पुरानी परंपरा को पुन: शुरू कराने आए थे, तब मुंडेश्वरी धाम में उन्होंने जनसभा को भी संबोधित किया था। उस दौरान सीएम ने इस अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल को देश के पर्यटन मानचित्र से जोड़ने और स्तरीय पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। तभी से धार्मिक न्यास समिति की मुंडेश्वरी ट्रस्ट द्वारा भगवती को तांडुल का नियमित भोग लगाया जाता है। जिला प्रशासन द्वारा मंदिर में ऑनलाइन प्रसाद चढ़ाने और डाक या कुरियर के माध्यम से संबंधित श्रद्धालु को तांडुल प्रसाद की होम डिलीवरी करने की भी सुविधा उपलब्ध कराई है।

बनारस के कारीगर तैयार करते हैं तांडुल प्रसाद

मां मुंडेश्वरी धार्मिक न्यास समिति के सचिव अशोक कुमार सिंह ने बताया कि तांडुल का अर्थ चावल होता है। तांडुल प्रसाद चावल के आटे को घी में भूनकर उसमें मेवा तथा चीनी या गुड़ मिलाकर लड्डू के स्वरूप में तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि मोकरी के गोविंदभोग या बासमति चावल से बनारस के कारीगरों द्वारा प्रसाद तैयार होता है। श्रद्धालुओं के लिए बिक्री काउंटर भी खोला गया है। दोपहर की आरती के दौरान तांडुल का भोग और संध्याकाल की आरती के दौरान खीर का भोग लगाया जाता है। दोनों वक्त चावल से तैयार प्रसाद का ही भोग लगता है।

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