आज मैं उस शख्स का परिचय आपसे तब कराऊंगा, जब आपको पूरी कहानी सुना चुका रहूंगा। आज संजय सिन्हा की कहानी की बस बहुत दूर चल कर जाएगी और उस शख्स की यादों को बहुत भीतर तक खंगालेगी, जो आधी रात को भी फोन की एक टूं-टूं पर चौंक कर खड़ा हो जाता है। तो चलिए, आज आप मेरे साथ कहानी की बस पर सवार होकर चलिए पटना से वेल्लोर। बात 90 के दशक की है। दवा की दुकान में काम करने वाले एक नौजवान के पिता के घुटनों का इलाज पटना में नहीं हो पा रहा था। पिता के घुटनों में काफी दर्द था और वो चल-फिर नहीं पाते थे। सात सौ रूपए महीना पाने वाले नौजवान ने अपने पिता को इलाज़ के लिए मां के साथ ट्रेन से वेल्लोर भेजा। उसने सुन रखा था कि वहां अच्छा अस्पताल है। पिता का इलाज शुरु हुआ तो बीच में मां की तबियत खराब हो गई। बेटे को पता चला तो नौकरी छोड़ कर वो वेल्लोर भागा। मां की तबियत बहुत खराब हो गई थी। बेटे ने वहीं मां का इलाज शुरू कराया।

इलाज तो शुरू हो गया, पर बेटे ने इलाज के दौरान देखा कि उस अस्पताल में खून की कमी से बहुत से मरीज़ों की मौत हो रही है। बहुत से ऑपरेशन में खून की ज़रूरत पड़ती, डॉक्टर खून देने की बात करते, पर गरीब और लाचार मरीज़ खून का इंतज़ाम नहीं कर पाते थे। इन नौजवान को मां के इलाज के लिए वहां करीब महीना-भर रहने का मौका मिला। उससे मरीजों की ये तकलीफ देखी नहीं गई। उसने कई लोगों को वहां जोड़ा, उन्हें समझाया कि रक्तदान करके कई मरीजों की ज़िंदगी बचाई जा सकती है। और वहीं से शुरू हुआ ज़िंदगी के मकसद का सफर। महीने भर बाद वो नौजवान मां-पिता को साथ लेकर वेल्लोर से पटना लौट आया। नौकरी छूट ही चुकी थी। सामने सवाल था कि अब क्या होगा? नौजवान ने तय किया कि अब वो अपना काम करेगा। पर अपने काम के साथ-साथ वो समाज के लिए भी काम करेगा।

सबसे पहले उसने पटना में अपने मारवाड़ी समाज से संपर्क किया। उनसे अपने मन की उसने बात कही। फिर उसने बहुत छोटे स्तर पर दवा का बिजनेस शुरू किया। पर उसका मन बिजनेस में कम रम रहा था, उसे तो नींद में भी वेल्लोर के वो मरीज़ आते थे, जो रक्त की कमी की वज़ह से दम तोड़ गए थे। अब संजय सिन्हा की कहानी की बस आगे बढ़ेगी, लेकिन पहले आपको मैं उस नौजवान का नाम बता दूं। उस नौजवान का नाम है Mukesh Hissariya वो पटना में रहते हैं। वहीं पले-बढ़े हैं। हां, तो वेल्लोर से लौटने के बाद उन्होंने अपने साथियों से बात की और तय किया कि वो सभी लोग पटना के अस्पतालों में जाकर रक्तदान करेंगे। बेशक उन्हें नहीं पता चलेगा कि उनके रक्त से किसकी जान बची, पर किसी की तो जान बचेगी। मुकेश ने खुद कई बार रक्तदान किया सबको समझाया कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर नहीं होता, बल्कि फायदा होता है। उन्होंने अपने साथियों को डॉक्टरों से मिलवाया। साथियों को समझाया कि अपने शरीर के रक्त से अगर किसी की जान कहीं बच जाए, तो इससे बड़ी बात क्या होगी? और आज किसी अनजान को रक्त की ज़रूरत आ पड़ी होगी, पर ये ज़रूरत तो कभी हमें भी पड़ ही सकती है। हम रक्त नहीं देंगे, तो कोई हमें भी रक्त नहीं देगा। और अभी तक फैक्ट्री में रक्त का निर्माण शुरू नहीं हुआ है कि पैसों को ज़ोर पर आप रक्त खरीद लेंगे। कोई देगा, तभी आपको मिलेगा। और फिर शुरू हुई मुहिम रक्तदान की।

धीरे-धीरे मुकेश ने हज़ारों लोगों को अपने से जोड़ लिया। लोग जुड़ते गए और रक्त दानियों की एक पूरा ब्रिगेड खड़ा हो गई। मुकेश ने अपनी इस मुहिम से कॉलेज के छात्रों को जोड़ा और आज पटना के एएन कॉलेज के सैकड़ों छात्र उनके साथ जुड़ गए हैं । बात यहीं नहीं रुकी।मुकेश कई संस्थाओं को ब्लड दिलवाते हैं। पर सबसे दिसचस्प है चलता-फिरता ब्लड बैंक।देश भर में चार हज़ार से अधिक लोग मुकेश के सीधे संपर्क में हैं। उनके नंबर, उनकी उम्र, उनके ब्लड का ग्रुप सब एक दूसरे के पास फोन पर उपलब्ध है। अब पूरे भारत में कहीं किसी को खून की ज़रूरत होती है, मुकेश के पास फोन पर टूं-टूं की आवाज़ होती है और मुकेश लग जाते हैं अपने काम में। जिस अस्पताल, जिस मरीज़ के पास से रक्त की ज़रूरत का संदेश आता है, वहां उनका चलता फिरता ब्लड बैंक पहुंच जाता है और रक्त दान करके चला आता है।

आज पटना से लगभग सभी अस्पतालों में मुकेश की मुहिम का रक्त उपलब्ध है। मुकेश का सपना है कि कहीं कोई खून की कमी के चलते न मर जाए। एक-एक संदेश को वो शिद्दत से पढ़ते हैं और चाहे आधी रात हो, अगर समय पर उनके पास खबर पहुंच गई कि फलां को खून की ज़रूरत है, तो मुकेश उसे यमराज के मुंह से छीन कर ले आएंगे, खून की वज़ह से मरीज़ को नहीं मरने देंगे। बात इतनी ही नहीं। मुकेश पटना में मां वैष्णो देवी के नाम से एक संस्था भी चलाते हैं। इस संस्था का काम है हर साल सैकड़ों गरीब-बेसहारा युवक-युवतियों की सामूहिक शादी करना। पिछले कई साल से ये संस्था इस काम को अपने दम पर बखूबी अंजाम दे रही है।शादी के बाद सामूहिक भोज कराते हैं और फिर शुरू होती है नए रिश्तों की नई कहानी।

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