मुंहासे के इलाज में ली जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाओं को लेकर रहें सतर्क, शोध में हुआ खुलासा

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 किशोरावस्था में मुंहासे का होना एक आम बात है। इसके इलाज के लिए बहुत सारे पारंपरिक नुस्खे से लेकर डाक्टरी इलाज भी लोग कराते हैं, जिसमें एंटीबायोटिक्स का भी इस्तेमाल होता है। लेकिन एक शोध में सामने आया है कि किशोरावस्था के दौरान हड्डियों का विकास होता रहता है और उस स्थिति में त्वचा संबंधी इस रोग के इलाज में प्रयुक्त कई एंटीबायोटिक्स हड्डियों के विकास को बाधित करते हैं। इसलिए, मुंहासे के इलाज में ली जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाओं को लेकर बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है।

मेडिकल यूनिवर्सिटी आफ साउथ कैरोलिना (एमयूएससी) के विज्ञानियों ने इस संबंध में शोध किया है। जर्नल आफ क्लीनिकल इन्वेस्टिगेशन (जेसीआइ) में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि मुंहासे के इलाज के लिए एंटीबायोटिक्स दवाओं को इस्तेमाल कई बार लंबे समय तक होता है, जो कभी-कभी दो साल तक भी चलता है। ऐसे में शोधकर्ताओं ने पाया है कि आंत में पाए जाने वाले जीवाणु (गट माइक्रोबायोम) और हड्डियों के स्वस्थ विकास के बीच एक गहरा संबंध होता है। ऐसे में माइनोसाइक्लिन जैसी एंटीबायोटिक दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल गट माइक्रोबायोम बिगाड़ सकता है, जिसका असर अंततोगत्वा किशोरों की हड्डियों के विकास पर पड़ता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि डाक्टर आमतौर पर मुंहासे के इलाज के लिए माइनोसाइक्लिन लेने की सलाह देते हैं। यह दवा टेट्रासाइक्लिन वर्ग की एंटीबायोटिक है, जिसमें टेट्रासाइक्लिन, डी-आक्सीसाइक्लिन तथा सेरेसाइक्लिन भी होता है। ये एंटीबायोटिक्स मुंहासे में बैक्टीरिया को फैलने से रोकने के साथ ही उसे मारने तथा रोम छिद्र को संक्रमण से बचाने व मुंहासे में बनने वाले मवाद जैसे पदार्थ में कमी लाने में मददगार होता है।

इसके असर की पड़ताल के लिए डाक्टरों ने चूहों पर प्रयोग किया। इसमें किशोरावस्था तथा उसके बाद के समय में इस दवा के असर को देखा गया। पाया गया कि माइनोसाइक्लिन थेरेपी से कोई साइटोटाक्सिक प्रभाव या सूजन जैसा दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। लेकिन गट माइक्रोबायोम की संरचना बदल गई और उसके प्रभाव से हड्डियों के द्रव्यमान और उसकी परिपक्वता में कमी आई। इतना ही नहीं, थेरेपी बंद होने के बाद भी गट माइक्रोबायोम तथा हड्डियों की अपनी प्राकृतिक संरचना और क्षमता हासिल नहीं हो पाई।

शोधकर्ता बताते हैं कि किशोरावस्था में अस्थियों का द्रव्यमान 40 प्रतिशत तक बन जाता है और इसकी परिपक्वता हमारे माइक्रोबायोम से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि हमने अस्थियों के विकास के इस चरण में प्रक्रियागत अवरोध पैदा किया तो हड्डियां अपना अधिकतम विकास प्राप्त नहीं कर पाएंगी। इस तरह से किशोरावस्था में माइक्रोबायोम में गड़बड़ियों का असर दीर्घावधिक होता है और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

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