बिहारी संस्कृति- मिथिलांचल के घरों में इस दिन नहीं जलता है चूल्हा

संस्कृति और परंपरा

हर राज्य की अपनी संस्कृति होती है। बैशाख नए साल का स्वागत ही नहीं बल्कि ग्रीष्म ऋतू का भी आगमन होता है।भारत के प्रत्येक राज्य में बैशाख के स्वागत का अपनी अलग परंपरा और तरीका है। उसी तरह बैशाख की पहली तिथि को मिथिलांचल में अनूठे अंदाज में मनाने की परंपरा है। इस दिन लोग घरों में चूल्हे नहीं जलाते हैं।

चैत की रात का बनाया खाना दूसरे दिन यानी बैशाख की पहली तिथि को खाया जाता है इसलिए इसे बासी पर्व कहा जाता है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर मनाया जाने वाला यह पर्व शीतलता का संदेश देता है लिहाजा लोग इसे जूड़शीतल भी कहते हैं। इस दिन अल सुबह घर के बड़े सदस्य अपने से छोटों के सिर पर जल देकर आशीर्वाद देते हैं।

व्याकरणाचार्य पं. कृपानंद मिश्र बताते हैं कि बैशाख में सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं। ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत हो जाती है। इस मौके पर लोग घड़ा में जल भरकर दान करते हैं।

Image result for tulsi pujaतुलसी के पौधे के उपर जल भर कर घड़ा टांगा जाता है जिससे उस पौधे पर पानी टपकता रहता है। यह एक महीना के लिए टांगा जाता है जिसमें पूजा के समय लोग जल भरते रहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में शीतलता की नीयत से यह सब किए जाने की मान्यता है।Image result for designer mitti ka chulhaइस दिन घर की महिलाएं अल सुबह चूल्हे की पूजा कर चूल्हा फिर से नहीं जलाती हैं। प्रसाद के रूप में बना हुआ भोजन चढ़ाया जाता है। इसके बाद महिलाओं द्वारा पेड़-पौधों में पानी दिया जाता है। यहां तक कि रास्तों पर पानी का छिड़काव महिलाओं द्वारा किया जाता है।

Image result for watering plantमान्यता है कि जितने अधिक पेड़-पौधों में पानी दिया जाएगा परिवार का कल्याण उतना अधिक होगा। रास्ते और पेड़-पौधों में पानी देने के लिए महिलाओं में होड़ सी लगी रहती है। बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष साहित्यकार भोला नाथ आलोक बताते हैं कि हर पर्व-त्योहार के पीछे परंपरा, लोक आस्था के साथ-साथ वैज्ञानिक रहस्य भी छिपा होता है।

बैशाख से ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है। यह पर्व जल की महता और अग्नि से परहेज को दर्शाता है।

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