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Saurav Anuraj | इंजीनियरिंग छोड़ कैसे बना ये लड़का बिहार का सफल photographer

एक बिहारी सब पर भारी
क्या आपको पता है photographer Saurav Anuraj के बारे में यह बातें ? 

Saurav Anuraj का रुझान बचपन से ही फोटोग्राफी की तरफ रहा। न्यूज़पेपर और मैगजीन्स में ख़ूबसूरत तश्वीरें देखकर उनकी आँखों में भी सपने सजते की कभी वो भी ऐसी बेहतरीन तश्वीरें लेंगे। लेकिन वहीं उनके गोल्ड-मेडलिस्ट पिता का सपना था की सौरव खूब पढ़-लिखकर इंजीनियर बने और एक अच्छी जॉब करे।

‘इंजीनियरिंग नहीं करोगे तो और क्या करोगे?’
‘इंजिनीरिंग की पढाई जब छोड़ दिए तो दूसरा काम क्या कर पाओगे पूरा?’

ऐसी और भी कई बातें सुननी पड़ी थी घर वालों की जब 2011 में वीआईटी यूनिवर्सिटी में अपनी इंजीनियरिंग की पढाई अधूरी छोड़ कर आये थे पटना के फेमस Saurav Anuraj . लेकिन सौरव ने जूनून और कड़ी मेहनत की बदौलत अपना मुकाम हासिल कर सभी को उनके सवालों का जवाब दे दिया।

बिहार के हिलसा में जन्में और पले- बढ़े Saurav Anuraj के पिता राजकुमार मजूमदार कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और माँ गृहणी हैं। सौरव का रुझान बचपन से ही फोटोग्राफी की तरफ रहा। न्यूज़पेपर और मैगजीन्स में ख़ूबसूरत तश्वीरें देखकर उनकी आँखों में भी सपने सजते की कभी वो भी ऐसी बेहतरीन तश्वीरें लेंगे। लेकिन वहीं उनके गोल्ड-मेडलिस्ट पिता का सपना था की सौरव खूब पढ़-लिखकर इंजीनियर बने और एक अच्छी जॉब करे।




हिलसा से दसवीं की पढाई पूरी करने के बाद Saurav Anuraj को उनके पिता ने पटना में इंजीनियरिंग एन्ट्रन्स की तैयार करने के लिए पटना भेजा। और फिर 2010 में सौरव का एडमिशन वीआईटी यूनिवर्सिटी, तमिल नाडु में हुआ।

सौरव बताते हैं की उस वक्त उनके पास सोनी का कॉम्पैक्ट डिजिटल कैमरा हुआ करता था जिसे वो हर वक्त अपने साथ रखते थे। और जहाँ कहीं भी कोई नज़ारा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता, उसे अपने कैमरे में कैद कर लेते। उनकी तश्वीरों को देखकर उनके दोस्त हमेशा तारीफ करते थे। फिर एक दिन उन्हें मौका मिला अपने कॉलेज के एक कल्चरल फंक्शन में फोटोग्राफी का। सभी ने दिल खोलकर उनके लिए तश्वीरों की प्रशंसा की। उसके बाद तो सौरव का रुझान पढ़ाई की तरफ और कम हो गया और फोटोग्राफी की तरफ बढ़ता गया।




उनका ये शौक अब उनका पैशन बन चुका था। फोटोग्राफी में मग्न Saurav Anuraj अक्सर अपनी क्लास अटेंड करना भूल जाते थे। सौरव को कहीं घूमने जाने का कोई शौक नहीं था। लेकिन उनके दोस्त उन्हें फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन जगह होने की बात कह मना लेते थे।

देखते ही देखते फर्स्ट सेमेस्टर की परीक्षाएं आ गईं। फोटोग्राफी का ऐसा धुन चढ़ा था की सौरव एक सब्जेक्ट का एग्जाम देने जाना भी भूल गए। इसकी बात जब सौरव के पिता को चली तो वही हुआ जो हर किसी के साथ होता है। फोटोग्राफी बंद करने को कहा गया साथ में सौरव को अपने प्यार, यानी अपने कैमरे से दूर रहने का निर्देश दिया।

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लेकिन सौरव फिर भी पढाई में मन न लगा सके। फोटोग्राफी में उनके जुनून को देखकर उनके प्रोफेसर ने भी सौरव को सलाह दी, “काम वही करो जो दिल से कर सको और मुझे पूरा यकीन है की तुम एक दिन फेमस फोटोग्राफर बनोगे।” प्रोफेसर की बात ने तो जैसे सौरव को रास्ता दिखा दिया।




फिर वो हुआ जिसे करने की हिम्मत लोग अक्सर नहीं कर पाते। सौरव ने अपना सामान बांधा और वापस अपने घर हिलसा चले गए। पहले तो सबको लगा की बेटा छुट्टियों में आया है, लेकिन जब मालूम हुआ की अपनी पढ़ाई छोड़ कर हमेशा के लिए घर आ गया है, तब घर में हंगामा शुरू हुआ।




सबने बहुत मनाने की कोशिश की कि सौरव वापस कॉलेज चला जाये। समाज और इज़्ज़त की दुहाई दी गई की सब क्या कहेंगे की प्रिंसिपल साहब का बेटा कॉलेज छोड़ कर भाग आया है! कितनी बेज्जती होगी हर जगह। फिर भी सौरव टस-से-मस न हुए।

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सौरव को तब तक भी ये नहीं पता था की आखिर उन्हें अब आगे क्या करना है। घर का माहौल बहुत ही बुरा था। माँ और पिता दोनों ने सौरव से बात करना बंद कर दिया था। सौरव वो दिन याद करते हुए कहते हैं, “मेरी ज़िन्दगी का वो सबसे बुरा दौर था। मैं बिलकुल अकेला और टूटा हुआ महसूस करता था।”

सौरव का दोस्त व्रिकेश भास्कर उस समय दिल्ली में पढ़ाई कर रहा था। उसने सौरव को बोला की दिल्ली आ जाओ और यहीं रह कर कुछ कर लेना। सौरव कहते हैं, “मैं अँधेरे में जी रहा था। जो रास्ता मुझे नहीं दिख रहा था, अब मुझे नज़र आ गया।” हिम्मत जुटा और घर वालों को मन कर सौरव ने अपने कदम बढ़ाये।




दिल्ली जाकर फोटोग्राफी की तरफ ध्यान दिया साथ डिजिटल फिल्म मेकिंग का कोर्स भी किय। साल 2012 में दिल्ली के MAAC institute से डिजिटल फिल्म मेकिंग का कोर्स किया और फिर काफी वक्त दिल्ली में कई बड़े लोगों के साथ काम सीखा।

“इमरान हाश्मी और एषा गुप्ता का शूट मेरा किसी सेलिब्रिटी के साथ किया पहला शूट था। मेरी ख़ुशी हौसला कई गुना और बढ़ गया जब एषा गुप्ता ने फेसबुक पर अपनी फोटो शेयर करते हुए मुझे फोटोग्राफी क्रेडिट दिया। वो मेरे लिए पहले अवार्ड से कम नहीं था जो मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था। उन्ही दिनों मैं अपने घर बिहार आया हुआ था। शादियों और त्योहारों का सीजन था।




मुझे एहसास हुआ की बिहार में वेडिंग फोटोग्राफी का अभी भी वही पुराना कांसेप्ट चल रहा है। उस वक्त तक दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और सभी बड़े शहरों में प्री-वेडिंग, वेडिंग और कैंडिड फोटोग्राफी का नया कॉन्सेप्ट बहुत पहले से चल रहा था। बिहार के लोग जो बाहर पढ़े थे और बाहर जॉब कर रहे थे, शादी करने के लिए तो उन्हें अपने घर बिहार ही आना होता था। यहाँ उन्हें वो फोटोग्राफी की फैसिलिटी नहीं मिल पा रही थी जो बड़े शहरों में थी।

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एक बार फिर सौरव को एक नया रास्ता दिखा। उन्हें यहाँ एक बड़ा बाजार नज़र आया। लेकिन इतना ही काफी नहीं था। अभी तो संघर्ष बाकी था। सौरव ने निर्णय ले लिया था की अब दिल्ली से वापस पटना आना है और अपना खुद का ब्रांड स्थापित करना है। फिर नीवं पड़ी म्याऊ स्टूडियो की। अमरजीत के साथ मिलकर सौरव ने अपनी टीम बनाई और शुरुआत हुई मुकाम हासिल करने के लिए एक और बड़ी जंग का।




लोग यहाँ पुराने तरीके की फोटोग्राफी में पूरी तरह ढले थे। किसी भी आर्गेनाईजेशन या समाज में एक नया बदलाव लाना इतना आसान नहीं होता। लोगों ज्यादा पैसे देने को राज़ी नहीं होते थे, और पूछते थे किस बात का पैसा मांग रहे, फोटोग्राफर्स को इज़्ज़त नहीं देते थे, ऐसे काम करवाते जैसे कोई नौकर हो। क्लाइंट्स ढूंढने में भी बहुत दिक्कतें आती थी।

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सौरव बताते हैं, “शुरू में आमदनी बहुत ही कम थी। उस वक्त न हमारे पास पूँजी थी, न क्लाइंट्स पैसे देते थे। हमारा मकसद अपने काम के साथ लोगों को नई स्टाइल ऑफ़ फोटोग्राफी के बारे में जागरूक करना। और इस काम में सोशल मीडिया ने हमारी बहुत ही मदद की। धीरे-धीरे जब हमारा काम लोगों को पसंद आने लगा तो लोगों ने हमारी और हमारे काम के ने तरीकों न लेवल समझा, बल्कि हमें रेस्पेक्ट भी करने लगे।




जिन्हे हमारा काम बहुत पसंद आया, वो और दूसरों को म्याऊ स्टूडियो के लिए रेकमेंड करते। धीरे -धीरे काम बढ़ा, टीम बढ़ी, फैसिलिटी बढ़ी और आज पटना में कई युवक फोटोग्राफी में अपना करियर बना रहे हैं। शादियों के सीजन में हमारी साथ-आठ टीमें रोज़ अलग अलग-अलग जगहों पर बुक रहती हैं।

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ऐसा भी वक्त आया जब नेशनल जियोग्राफिक और WHO ने प्रोजेक्ट के लिए हमें एप्रोच किया, लेकिन किसी के अंडर उसके तरीके से काम करना सौरव को मंजूर नहीं था। उन्हें तो अपनी टीम के साथ ही काम करना था।

“आज मेरे पास पैसा, नाम, शौहरत, इज़्ज़त, माँ-पिता का प्यार और वो सब है जो शायद मेरे पास तब न होता जब मैंने जबरदस्ती में इंजीनियरिंग की पढाई की होती और एक अच्छा इंजीनियर न बनकर एक औसत इंजीनियर रह जाता। कभी शुन्य से शुरू किया और आज एक दिन का पैकेज की शुरुआत पचास हज़ार से होती है।




कमाई से ज्यादा खुशी तो तब होती है जब माँ और पापा गर्व से लोगो को बताते हैं की हमारा बेटा फोटोग्राफर है।” ये बताते हुए सौरव की आँखों की चमक और बढ़ जाती है।meow studio

 

सौरव न केवल एक फेमस फोटोग्राफर हैं जिन्होंने कई युवकों को फोटोग्राफी में अपना करियर बनाने के लिए प्रेरित किया, बल्कि अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए पटना के ही रोहित रॉय के साथ ” हर मोड़ पर बचपन बिकता है” कैम्पेन की शुरुआत की जो झुग्गी-झोपडी में रहने वाले गरीब बच्चों की पढाई के लिए जागरूकता फैलाता है और सुविधा भी मुहैया कराता है। इसके साथ ही सुसाइड प्रिवेंशन जैसी संवेदनशील मुद्दों पर राइटर स्वाति कुमारी के साथ एक फोटोस्टोरी बुक “मायरा- द एसेंस ऑफ़ लाइफ” बनाया जिसकी प्रशंशा इंटरनेशनल लेवल की सुसाइड प्रिवेंशन पर काम करने वाली ऑर्गनिज़तिओन्स ने भी की।




एक बिहारी सब पर भारी सौरव को ढेर सारी शुभकामनाएं देता है और आशा करता है की सौरव और म्याऊ स्टूडियो इसी तरह कामयाबी की बुंलदियो को छूती रहे।

rj anjali



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