माथे पर संस्कृति की बिंदिया, हाथों में देश के लिए बंदूक; बिहार के गया की इस बेटी ने ऐसे पूरे किए सपने

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पांवों में महावर, हाथों में मेंहदी, माथे पर चुनरी ओढ़े शादी के लाल जोड़े में ससुराल के द्वार पर जिस दुल्हन का घर-परिवार और समाज ने स्वागत किया, उसके हाथों में आज बंदूक है। बंदूक देश की रक्षा के लिए, वह यही सपना तो बचपन से देखती आई थी। माथे पर सजी बिंदिया अपनी संस्कृति तो हाथों में बंदूक देश के लिए। बिहार के गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के गणेशीडीह की बेटी आशा के सपनों की राह में न समाज बाधा बना, न ही शादी। सुदूर किसी बस्ती में बेटियों के मन में पल रहे ऐसे सपने ही इस देश की ताकत हैं, और उस बदलते समाज का उदाहरण, जहां वे भी दम के साथ कह सकती हों- हम भी लड़ेंगे, अपने देश के लिए।

मायका और ससुराल दोनों ने दिया साथ

बसंत प्रसाद की तीसरी संतान आशा विवाह योग्य हुई तो 2011 में वजीरगंज थाना क्षेत्र के कइया के रहने वाले निरंजन कुमार से शादी कर दी गई। उसने बचपन से ही देश के लिए वर्दी पहनने की इच्छा पाल रखी थी और ससुराल भी पहुंची उसी सपने के साथ। जहां के ग्रामीण परिवेश में आज भी कई तरह के बंधन हों, वहां मायका और ससुराल दोनों ने इस इच्छा का सम्मान किया। यह समाज का बदलता सोच था।

बीएसएफ में चयन, सिलीगुड़ी में तैनात

आसपास मैदान नहीं था। आशा गांव में ही पहाड़पुर स्टेशन के पास दौड़ लगाती रही। तपस्या रंग लाई और 2013 में सीमा सुरक्षा बल में चयन हो गया। वे इस समय सिलीगुड़ी में तैनात हैं।

बेटे-बेटी को आफिसर बनाने की इच्‍छा

आशा बताती हैं कि दो साल एलओसी पर तैनात रहीं। इस दौरान वहां के अनुभव ने देश सेवा के संकल्प को और मजबूत कर दिया। दो संतानें हैं, बेटी को आइपीएस अफसर बनाना चाहती हैं और बेटे को आर्मी आफिसर के रूप में देखना चाहती हैं। इसलिए अभी से ही दोनों को अच्छी शिक्षा देने का प्रयास कर रही हैं। कहती हैं, ”मैं तो सुदूर गांव में थी, वर्दी का सपना पूरा हो गया, पर अफसर नहीं बन पाई। बच्चों को अफसर के रूप में देखना चाहती हूं।” कहती हैं, ”समाज और देश बदल रहा है। बेटियां कहीं किसी से कम नहीं हैं। जब हाथों में बंदूक लेकर अपनी साथियों के साथ देश के लिए खड़ी होती हूं तो उस गर्व की अनुभूति ही एक अलग होती है।”

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