बिहार की ‘लता मंगेशकर’ गंगा घाट पर भीख मांगने को है मजबूर, संतान ने छोड़ दिया साथ

जिंदगी

बिहार की राजधानी पटना में आपको दरभंगा हाउस के पास काली घाट पर एक महिला आपको दिखेगी जिनका नाम पूर्णिमा देवी हैं. कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर इनका एक वीडियो खूब वायरल हो चला था जिसमें वो गाना गाती दिखाई देती हैं, ‘मानो तो मैं गंगा मां हूं’…इस गाने को सुनकर लोग वहां ठहरते हैं और जो कुछ बन पड़ता है वो इस बूढ़ी महिला को दान दे देते हैं.

लेकिन आपको बता दें कि एक जमाने में लोग इन्हें अव्वल गायकी और मधुर आवाज के लिए जानते थे. लोग इन्हें बिहार की लता मंगेशकर की संज्ञा देते थे पर आज वह गुमनामी के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं. मुसीबत की घड़ी में आज न तो उनका परिवार साथ है और न ही सरकार. इनकी जिदंगी में बदहाली का आलम इस कदर है कि राजधानी पटना स्थित गंगा घाट पर वह भीख मांग कर अपना गुजर-बसर करती हैं.

75 वर्षीय पूर्णिमा देवी काली घाट के आस-पास ही दिखती हैं. संतान ने जब से उनका साथ छोड़ा है, तब से वह यहीं भजन गाती हैं और रहती हैं. उन्होंने एक चैनल को बताया, “मैं शरीर से लाचार हो चुकी हूं. मेरा एक बेटा अवसाद में आ गया, इसलिए मैं मां काली के मंदिर में भजन गाती हूं. मां की उपासना करती हूं. दुआ मांगती हूं कि भगवान उसे सही कर दें. वह अच्छा गायक था.”

बकौल पूर्णिमा देवी, “मैं दिल्ली सरकार की रजिस्टर्ड आर्टिस्ट थी. उन दिनों गायन प्रतियोगिता में मैं प्रथम आई थीय मेरी स्थिति मीडिया ने देखी-सुनी, पर सरकार उदासीन बनी रही.” बता दें कि साल 1995 में इन्होंने मगही गीत “यही ठईया टिकुली हेरा गईल” गीत लिखा था, जिसे आज पूरे बिहार में गाया जाता है.

वी. शांताराम और लक्ष्‍मीकांत-प्‍यारेलाल के साथ काम कर चुका है यह दिग्‍गज, अब सड़क पर मांग रहा भीख स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उनका बेटा मानसिक रोगी है, जबकि बेटी कुछ साल पहले मुंबई चली गई थी. वहीं, उनके पिता दार्जिलिंग स्थित महाकाल मंदिर में मुख्य पुजारी हरिप्रसाद शर्मा थे.

सूबे की मगही गीतकार की शादी डॉ.एचपी दिवाकर से हुई थी, जो कि यूपी के बाराबंकी से थे. 1984 में जमीनी विवाद में पति की हत्या कर दी गई थी.

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