कोरोना काल में शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली (इम्युनिटी सिस्टम) को बेहतर बनाने को लेकर जहां तमाम प्रयास किये जा रहे हैं, वहीं मखाना वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार ने एक रिव्यू रिसर्च पेपर तैयार कर एमीनो एसीड से युक्त मखाना को बेहतर बताया है। मखाने में काफी मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह शरीर के कई तंत्रों को मजबूती प्रदान करता है। डब्ल्यूएचओ और एफएओ, जेनेवा के रिसर्च में भी यह बात सामने आई है कि चावल, गेहूं, सोयाबीन, लाल साग, मां का दूध, गाय का दूध, मछली व मटन से ज्यादा पोषक तत्व मखाना में पाए जाते हैं।

भोला पासवान शास्त्री कृषि कॉलेज के मखाना वैज्ञानिकों ने रिव्यू-रिसर्च पेपर तैयार कर मखाना में विद्यमान पोषक एवं औषधीय गुणों के प्रचार-प्रसार कर इसकी खेती को बढ़ावा देने और इसके माध्यम से आॢथक क्रांति लाने की योजना बनाई है। डॉ. अनिल बताते हैं कि  पोषक तत्वों एवं औषधीय गुणों का भंडार मखाना पाचन तंत्र, जनन तंत्र समेत अन्य तंत्रों को भी संपुष्टि प्रदान करता है। इसका सेवन करने से हृदय रोग व मधुमेह के रोगियों को काफी लाभ मिलता है। चीन की प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था में मखाना का क्यान शी के नाम से प्रयोग किया जाता है। बकायदा मखाना को एक अवयव के रूप में सम्मिलित कर हर्बल सपोजिटरी के तौर पर उपयोग किया जाता है। 

डॉ. अनिल बताते हैं कि दो लाख हेक्टेयर बेकार पड़े वेटलैंड वाले कोसी-सीामांचल के इलाके में किसानों को मखाना में विद्यमान पोषक तत्वों व औषधीय गुणाों की जानकारी दी जाएगी। वह बताते हैं कि एक हेक्टेयर में मखाना की खेती में लगभग एक लाख का खर्च आता है। औसतन उपज 30 ङ्क्षक्वटल गुर्री प्राप्त होती है। इसे बेचने पर लगभग 3.5 लाख रुपये प्राप्त होते हैं। यानी औसतन दो लाख से 2.5 लाख रुपये शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। अगर लावा उत्पादन करेंगे तो यह मुनाफा और अधिक हो जाता है। मखाना के साथ मत्स्य उत्पादन पर कम से कम लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। 

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ आरके सोहाने ने बताया कि केंद्र सरकार के किसानों की आमदनी दोगुनी करने की योजना के साथ-साथ कोविड 19 के लिए उपयुक्त माने जाने वाले मखाना का वैल्यू एडिशन भी किया जाएगा। 

Sources:-Dainik Jagran

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