महिलाओं में भागलपुरी सिल्क का बढ़ रहा क्रेज, बनारसी को दे रही टक्कर, पांच सालों 150 प्रतिशत बढ़ा कारोबार

प्रेरणादायक

भागलपुरी सिल्क साड़ी की पहचान बढ़ती जा रही है। अब अधिकांश महिलाएं बनारस और सूरत नहीं, बल्कि भागलपुरी सिल्क साड़ी पहनना चाहती हैं। आकर्षक डिजाइन व उच्च गुणवत्ता के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। पिछले पांच सालों में बनारसी साड़ी का कारोबार भी 50 से बढ़कर दो सौ करोड़ रुपये का हो गया है। भागलपुर की अधिकांश दुकानों में भी अब सिल्क की साड़ियां काफी बिक रही हैं। पहले यहां सूरत, बनारस आदि जगहों की साड़ी महिलाओं की पसंद हुआ करती थी। साड़ी का कारोबार बढ़ने से स्थानीय व्यापारियों के साथ बुनकरों को भी सालाना अच्छी कमाई हो जाती है।

साड़ी विक्रेता श्रवण बाजोरिया ने बताया कि हाल के वर्षों में देशभर में भागलपुर सिल्क साड़ी का बड़ा बाजार बनकर उभरा है। यहां 50 से अधिक थोक विक्रेता हैं, जो साड़ी का खुद मैन्युफैक्चरिंग करते हैं और बाहर के व्यापारियों के माध्यम से इसे विदेश तक बेच रहे हैं। यहां की टेक्नोलॉजी अब ज्यादा डेवलप हो चुकी है। नई-नई डिजाइन में खूबसूरत साड़ियां तैयार हो रही हैं। इस कारण महिलाओं में भागलपुरी साड़ी का क्रेज बढ़ा है। स्थानीय दुकानों में भी सिल्क की कई वेरायटी की साड़ियां बिक रही हैं

 

वर्षों पुरानी कहावत को किया गलत साबित

 

सिल्क व्यापारी कुंजबिहारी झुनझुनवाला ने बताया कि पहले एक कहावत थी कि ‘भागलपुर जइयो तो कपड़ा लइयो मत…।’ जो भागलपुर के लिए एक व्यंग्य की तरह था। उस समय डल कपड़ों में साड़ी, धोती, चादर तैयार होती थी जो धोने के बाद सिकुड़ जाती थी। अब यहां सिल्क, लिनन, मटका, तसर, मलवारी आदि की साड़ियां खूब बन रही हैं। भागलपुर के बाजारों में भी 100 में 60 साड़ी भागलपुर की ही बिक रही है।

 

एक-एक डिजाइन में 50 से अधिक रंग की साड़ियां उपलब्ध

बिहार बुनकर कल्याण समिति के सदस्य अलीम अंसारी ने बताया कि यहां के बुनकर इतने हुनरमंद हैं कि वह साड़ी के आंचल में कौन रंग डाले व उसमें क्या बुटिक होनी चाहिए, खुद तय कर लेते हैं। यहां की साड़ी हाथ की बनी होती है। हाथ की साड़ी की खूबसूरती व डिजाइन काफी उभर कर आती है। इस कारण देशभर की महिलाएं उसे पहनना पसंद करती हैं।

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