महात्‍मा गांधी ने माना था अपना गुरु, बिहार के एक मामूली किसान ने ऐसे बदली आजादी की लड़ाई की दिशा

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चंपारण आंदोलन के बाद भारतीय स्वाधीनता संग्राम का परिदृश्य ही बदल गया था। इसके बाद महात्मा गांधी का प्रभाव बहुत बढ़ गया। इस ओर गांधी जी का ध्यान आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाई थी पंडित राजकुमार शुक्ल ने। उनके बारे में गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में भी जिक्र किया है। पंडित राजकुमार शुक्ल की पुण्यतिथि (20 मई) पर उस दौर को याद करना मौजूं है।

मुरली भरहवा गांव के लोगों की जिद पर चंपारण आए थे गांधी 

पश्चिम चंपारण जिले में पंडई नदी के किनारे बसा मुरली भरहवा गांव। गौनाहा प्रखंड अंतर्गत इस गांव के लोगों के खून में जिद्दी होने का स्वभाव है। तभी तो आज से करीब 100 साल पहले यहां के एक सामान्य किसान पंडित राजकुमार शुक्ल ने अंग्रेजों को भगाने की ऐसी जिद ठानी कि मोहनदास करमचंद गांधी को गुजरात से चंपारण आना पड़ा था। चंपारण आंदोलन देश की स्वाधीनता के संघर्ष का मजबूत प्रतीक बन गया।

गांधी जी ने माना था अपना तीसरा गुरु 

अंग्रेजों को भारत से खदेड़कर देश स्वतंत्र कराने वाले गांधी जी ने राजकुमार शुक्ल के राष्ट्र व समाजहित की इस जिद की बदौलत उन्हें अपना ‘तीसरा गुरु’ माना। भैरवलाल दास की पुस्तक ‘महात्मा गांधी के तीसरे गुरु पं. राजकुमार शुक्ल’ के आलोक में प्रोफेसर (डा.) रत्नेश्वर मिश्र कहते हैं, ‘1857 के सिपाही विद्रोह के बाद बिहार के सबसे बड़े जननेता पंडित राजकुमार शुक्ल ही हुए। गांधी को चंपारण आमंत्रित करने में सफल होते ही भारत के स्वाधीनता आंदोलन का परिदृश्य ही बदल गया। सिपाही विद्रोह के लगभग 60 वर्ष बाद चंपारण आंदोलन ही देश के सबसे सफल आंदोलन के रूप में इतिहास में वर्णित है।’

दूसरों से लिखवाते थे पत्र

महात्मा गांधी ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है-‘राजकुमार शुक्ल सीधे-सादे, लेकिन जिद्दी शख्स थे। उन्होंने अपने इलाके के किसानों की पीड़ा और अंग्रेजों के शोषण की दास्तान बताई। मळ्झसे इसे दूर करने का आग्रह किया।’ पहली मुलाकात में गांधी जी उनसे प्रभावित नहीं हुए थे, इसलिए टाल दिया, मगर पंडित राजकुमार शुक्ल ने हार नहीं मानी। वे कम-पढ़े लिखे होने के कारण उस जमाने के विद्वान लोगों से महात्मा गांधी के लिए पत्र लिखवाते थे।

पीर मोहम्‍मद मुनीस से लिखवाते थे पत्र 

बताया जाता है कि वे उस जमाने के पत्रकार पीर मोहम्मद मुनीस से गांधी जी के लिए पत्र लिखवाते थे। पहले मुनीस पत्र लिखकर शुक्ल को सुनाते थे। उसका भाव उन्हें पसंद आता था, तब उसे गांधी जी को भेजते थे। एक पत्र में उन्होंने लिखवाया-‘किस्सा तो सुनते हो औरों का, आज मेरी दास्तां सुनो। जिस प्रकार भगवान श्रीरामचंद्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गईं, उसी प्रकार श्रीमान के चंपारण में पैर रखते ही हम प्रजा का उद्धार हो जाएगा।’ इस पत्र ने गांधी जी को काफी प्रभावित किया।

 

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