3000 साल पुराने इस मंदिर में कभी मुगल बादशाह ने भी यहां नवाया था सिर, नवरात्र में दूर-दूर से आते हैं लोग

आस्था

पटना सिटी के तख्त श्री हरिमंदिर साहिब व सिद्धपीठ छोटी पटनदेवी मार्ग के बीच में स्थित काली स्थान मोहल्ले में स्थापित 3002 हजार वर्ष प्राचीन काली मंदिर शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र है।

सुनहरे इतिहास वाले मां काली मंदिर में तांत्रिक अपनी सिद्धि क्रिया भी करते हैं।

नवरात्र की महाअष्टमी व महानवमी पर यहां गोद भराई के लिए महिलाओं की भीड़ जुटती है। लोगों की मानें तो मां काली पटना नगर की रक्षिका हैं।

इस मंदिर में आदिशक्ति के रूप में मां काली की हजारों वर्ष पुरानी काले पत्थर की प्रतिमा है। इसे लोग श्मशान काली भी कहते हैं।

पंडित शशिकांत मिश्र की मानें तो प्रतिमा की विशेषता यह है कि अन्य प्रतिमाओं के समान मां काली की जीभ बाहर नहीं निकली है।

पटना सिटी में खेद जताती मुद्रा में हैं नगर रक्षिका सिद्धदात्री मां काली। पुरातन मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यह मंदिर गंगा व सोन नदी के संगम पर बसा था।

निर्जन क्षेत्र होने के कारण मंदिर में तांत्रिकों का जमावड़ा रहता था। नदी के दूर जाने से धीरे-धीरे मोहल्ले में आबादी बढ़ती गई।

आज यह मोहल्ला काली स्थान के नाम से विख्यात है। इस मंदिर में मुगल बादशाह शाह आलम द्वारा माता के श्रृंगार के लिए कीमती हीरे जवाहरात व मोती जड़े गहने, मुकुट, तलवार, घंटा भेंट किया गया था।

मंदिर के अंदर नेपाल नरेश रण बहादुर शाह द्वारा प्रदत संवत 1853 में अष्टधातु से निर्मित विशाल घंटा मां काली के चरणों में भेंट किया गया।

नेपाल नरेश ने ही मंदिर परिसर में चहारदीवारी का निर्माण कराया था। बुजर्गोँ की मानें तो यहां रौद्र नहीं बल्कि खेद जताती मुद्रा में मां काली हैं।

स्थानीय लोगों ने बताया कि लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व बाबा मस्त राम नामक तांत्रिक ने इस मंदिर का निर्माण कर पूजा-अर्चना शुरू की थी।

मंदिर के पुजारी बाल ब्रह्मचारी हुआ करते थे। परिसर में मां काली के अलावा भगवान बजरंगबली, शिव, भैरव, योगनियां की मूर्ति हैं।

हजार वर्ष प्राचीन काली मंदिर में नेपाल नरेश द्वारा प्रदत अष्टधातु से निर्मित विशाल घंटा है।

इस मंदिर में महिलाओं की आस्था अधिक है। खासकर महाअष्टमी व महानवमी को गोद भराई के लिए महिलाओं की काफी भीड़ देखने को मिलती है।

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